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तीसरे दिन से ही शुभांग की तबियत बिगड़ने लगी। उसके सारे शरीर में
दर्द होने लगा और वो काँपने लगा। यह देखकर हम तुरंत ही उसे दुबई
अस्पताल लेकर भागे जहाँ उसके इलाज चल रहा था। वो बेहोश हो चुका था।
अस्पताल में तुरंत ही उसे आपातकालीन चिकित्सा-कक्ष (ICU)
में रख दिया गया। वह 21 दिन तक वेंटिलेटर पर रखा गया और ईश्वर की
कृपा से ठीक होकर घर आ गया।
इस
बात के दो महिने बाद एक दिन हमने देखा कि शुभांग जहाँ सोया था वहाँ
बिस्तर (तकिये पर) पर खून के निशान थे। हमें चिंता होना स्वाभाविक
था और फिर हम अपने बेटे को लेकर अस्पताल भागे जहाँ पहले से ही उसका
कैंसर का इलाज चल रहा था। डाक्टरों ने वहाँ उसका ब्लड-टेस्ट किया
और बताया कि उसके प्लेटलेट की संख्या में भारी कमी आ गई थी जिसके
कारण खून मुँह से निकल पड़ा था। सामान्यतया हमारे शरीर में
प्लेटलेट की संख्या 150000-400000 के बीच
में होती है और 30000-40000 से कम होने पर
खून कभी भी कहीं से (मुँह, नाक अथवा कान) से निकल सकता है।
डाक्टरों ने तुरंत ही शुभांग को प्लेटलेट चढ़ाये
और फिर हम उसे वापस घर ले आये। परंतु 15 दिनों बाद जब हम नियमित
टेस्ट के लिये फिर अस्पताल गये तो हमें पता चला कि उसकी प्लेटलेट
संख्या फिर गिर गई थी और यह खतरे की बात थी। उसे फिर से प्लेटलेट
चढ़ाने पड़े। यह सिलसिला कुछ समय चला और फिर धीरे प्लेटलेट की
क्षमता गिरती गई और हर 4-5 दिन में ही ऐसे ट्रांसफ्यूजन की जरूरत
पड़ने लगी। डॉक्टर ने कुछ दवाई बताई जिससे प्लेटलेट बढ़ाया जा सकता
है। हमने वो दवाई भी उसे खिलाई परंतु कुछ दिनों बाद फिर वही नतीजा
रहा - प्लेटलेट फिर से कम हो गये। डाक्टर दवा बदलते रहे और हरेक नई
दवा के साथ वही किस्सा होता रहा - कुछ दिन तो दवा काम करती फिर
उसका असर खत्म हो जाता और अगली बार के लिये वो दवा कारगर नहीं रहती
थी। और इस तरह से लगभग एक साल तक हम इस
परेशानी से जुझते रहे।
चिकित्सा जगत में यह बीमारी कुछ खास नहीं है जिसमें प्लेटलेट
संख्या कम हो जाती है, परंतु हमारे बेटे के मामले में यह थोड़ा
टेढ़ा काम हो गया था क्योंकि उसे कैंसर भी था। हमने शुभांग को
महंगी से महंगी दवाइयाँ दी परंतु अंत में डाक्टरों ने जवाब दे
दिया कि अब उनमें से किसी भी दवा से कुछ लाभ नहीं हो रहा था।
यह
कोई अच्छी खबर नहीं थी।
ऊपर से, कुछ दिनों के और प्रयास के बाद डाक्टरों
ने पूरी तौर से जवाब दे दिया और हमसे कह दिया कि उनसे अब शुभांग कि
इलाज नहीं हो सकता और उसे हम कहीं और ले जायें। उन्होंने बताया कि
इस बीमारी के लिये लगने वाली हरेक दवा उन्होंने दे कर देख ली थी और
अब इसके अलावा कोई ऐसी दवा नहीं थी जिससे उसका इलाज हो सके।
उन्होंने बताया कि पूरी दुनिया में अब इसका बस एक ही इलाज था
जिसमें शरीर का एक भीतरी अंग निकालना पड़ता (spleen
removal)। इस इलाज की खामी यह थी कि इसके बाद
शुभांग को ज़िन्दगी भर दवाइयों पर जीना पड़ता।
यह हमें मंजूर नहीं था।
हम बहुत निराश हो गये और सोचने लगे - “क्या
करें और क्या न करें , कहाँ जायें?”। हमारे
पास इलाज के लिये पैसा भी नहीं था परंतु ईश्वर की ही कृपा से अब तक
इलाज हो पाया था। हम अपनी तरफ से वो सब कुछ कर चुके थे जो हम कर
सकते थे और अब हम आगे के बारे में सोच रहे थे।
जब दुबई अस्पताल से जवाब दे दिये जाने के बाद कुछ
ही दिन बचे थे, तब एक दिन अस्पताल में हमारे बेटे के पासे वाले
बिस्तर पर लेटे मरीज के लिये प्रार्थना करने के लिये एक महिला आयी।
उन्होंने हमारे बेटे के लिये भी प्रार्थना की। उन्होंने कहा कि
“प्रभु यीशु पर विश्वास करें तो आपके
बेटा ठीक हो जायेगा”। उसके बाद चर्च से
कुछ और भाई भी हमारे बेटे के लिये प्रार्थना करने के लिये आये।
हम अपने बेटे से बहुत प्यार करते हैं, और इसलिये
आगे के इलाज के लिये हम उसे तुरंत ही मुम्बई ले गये और हमने यीशु
मसीह पर विश्वास भी किया और वहाँ कि स्थानीय कलीसिया (चर्च) के
भाई-बहनों तथा पास्टर से भी संपर्क किया ताकि निरंतर प्रार्थना हो
सके। वहाँ भी डाक्टर उन ही दवाइयों से हमारे बेटे का इलाज करने लगे
जिनसे दुबई में हो रहा था और नतीजा समान ही था।
डॉक्टरों ने हमें चेताते हुए यह बताया कि जब तक यह
खून का आना नाक, मुँह या कान से
हो तब तक तो वो परिस्थिति को संभाल
सकते थे परंतु यदि खून दिमाग में चला गया तो फिर उसे ठीक कर पाना
उनके लिये भी संभव नहीं होगा। इलाज चलता रहा और कुछ दिनों बाद वही
हुआ जिसका हमें डर था। शुभांग ने अपने सिर में दर्द होने की शिकायत
की डॉक्टरों ने जल्दी से उसका MRI करवाया।
हमारा बेटा अचेत हो गया और फिर वो अर्ध-कोमा में चला गया। उसको फिर
से आपात-कालीन वार्ड में पहुँचा दिया गया।
वो
डाक्टर जो हमारे बेटे का इलाज कर रहे थे वह पूरे एशिया में
जाने-माने डॉक्टर हैं - परंतु शुभांग के मामले में वो भी डर से गये
थे और अपने आप को असहाय महसूस करने लगे। कोई भी डॉक्टर हमारे बेटे
के बारे में सही सही जानकारी देने में असमर्थ थे क्योंकि खून दिमाग
में रिस चुका था इसलिये वे कुछ भी कहने की हालत में नहीं थे। कुछ
समय में ही डॉक्टरों ने हमसे कह दिया को जो कोई भी शुभांग को आखिरी
समय में देखना चाहे उनको बुलवा लिया जाये क्योंकि चिकित्सा ज्ञान
के अनुसार अब उसके इलाज की सीमा खत्म हो गई थी।
मेरी
पत्नि ICU में शुभांग के पास बेठी दिन और
रात बाइबल पढ़ती रही और
प्रभु यीशु के नाम से मांगती रही कि
“प्रभु यीशु, आपके कोड़े खाने से हमारा बेटा चंगा
हो गया है”. बहुत से लोग हमारे बेटे के
लिये दुआ कर रहे थे। रातोंरात के ऐसा आश्चर्यकर्म हुआ जिसका हममें
से किसी को भी अंदेशा नहीं था। प्रभु यीशु पर विश्वास और उनके वचन
की सामर्थ ने उन ही दवाइयों को जो बेकार हो चुकी थी हमारे बेटे पर
काम करवाना शुरू कर दिया। एकाएक उसके प्लेटलेट संख्या 480000
तक पहुँच गई। शुभांग ने आँखें खोल दी।
सभी डॉक्टरों को बड़ा आश्चर्य हो गया कि यह असंभव
काम संभव कैसे हो गया। अगले दिन वो सब हमसे पूछने लगे -
“तुमने
क्या किया है?” उनको मालूम था कि परिस्थिति
ऐसी हो चुकी थी जिसमें चिकित्सा विज्ञान के अनुसार आगे कोई आशा
नहीं थी और वो अपने सब प्रयास कर विफल हो चुके थे। हमने बताया कि
बस हमने प्रभु यीशु के नाम से प्रार्थना की थी और उसका काम वहाँ से
शुरू होता है जहाँ से हमारे मानवीय काम खत्म हो जाते हैं। शुभांग
जल्दी ही ठीक होने लगा और 2 दिन में आपातकक्ष से बाहर आ गया और
अगले दो दिन में अस्पताल से उसको छुट्टी मिल गई। डाक्टरों के लिये
आश्चर्य की बात सिर्फ यह नहीं थी कि शुभांग ठीक कैसे हो गया बल्कि
यह भी थी कि इतना जल्दी कैसे ठीक हो गया।
आज हमारा बेटा शुभांग 9 साल का है और प्रभु की
अनुकंपा से बिल्कुल ठीक है। उसके दिमाग अथवा शरीर को कोई विपत्ति
छू नहीं सकी है अपितु परमेश्वर ने उसे ऐसा छू लिया है कि वो आज
बहुत बुद्धीमान, समझदार, एक्टिव तथा नम्र एवं प्रार्थनाशील बच्चा
है। वो अपने उम्र के बच्चों के जैसा ही है फिर भी बहुत सी बातों
में वो उन सब से अलग
(और बेहतर) भी है। हम ईश्वर के बड़े धन्यवादित हैं कि
उसने हमारे जीवन में
यह बड़ा काम किया है। हम अपने उन सभी भाई-बहनों
के भी शुक्रगुजार हैं जिन्होंने हमारे बेटे के लिये बड़ी
प्रार्थनायें की हैं और उनके भी जिन्होंने इलाज का खर्च उठाने में
समय पर हमारी सहायता की है। हम प्रभु यीशु को सारा आदर और महिमा
देते हैं।
इस
घटना के द्वारा परमेश्वर ने अपना प्रेम हम पर प्रकट किया है।
उन्होंने दिखाया है कि हमारा सृष्टिकर्ता ईश्वर हमारे जीवन में
रूचि लेता है और हमसे व्यक्तिगत संबंध बनाने में रूचि रखता है और
हमें हमारे सारे पापों तथा अधर्मों से छुटकारा दिलाना चाहता है।
हमने अपने पापों की क्षमा के लिये प्रभु यीशु पर विश्वास किया है।
अब हम जानते हैं कि हरेक भली वस्तु परमेश्वर की ओर से ही आती है।
हमारे भले और धर्म के काम हमें पापों से छुटकारा नहीं दिला सकते
बल्कि प्रभु यीशु के क्रूस पर किये बलिदान पर विश्वास के द्वारा ही
हम न्याय के दिन के लिये अपने आप को तैयार कर सकते हैं। ईश्वर को
किसी ने नहीं देखा है परंतु उसके कामों के द्वारा हम उसे जान सकते
हैं। पाप लेकर कोई उसके सम्मुख खड़ा नहीं हो सकता है पर यीशु मसीह
के द्वारा हम पाप-मुक्त हो जाते हैं और हमारा मोक्ष हो जाता है। आप
इस बात पर विश्वास कर सकते हैं।
प्रिय पाठक, क्या आप जानते हैं कि
यीशु मसीह
परम-सत्य हैं, परम-ईश्वर हैं, परमात्मा हैं जो सभी बीमारियों और
तकलीफों से ऊपर हैं और हमें इन सभी बातों से छुटकारा दिला सकते
हैं। उनके पास जीवन देने और लेने का अधिकार है, उनके पास हमारे
पाप-क्षमा करने का भी अधिकार है। मोक्ष (उद्धार) उनके द्वारा ही हो
सकता है। इस बात से फर्क नहीं पड़ता कि आप किस धर्म में पैदा हुए
हैं, आप प्रभु यीशु पर विश्वास करें और आशीष पायें।
यदि इस गवाही को पढ़ने से आपके विश्वास में वृद्धी हुई है या आप अब
यीशु मसीह पर विश्वास करने लगे हैं और उसे अपने उद्धारकर्ता के रूप
में अपनाने के लिये तैयार हैं तो निम्न प्रार्थना करें –
“प्रिय परमेश्वर, आज मैंने जाना है कि आप
मृत्यु, जीवन, बीमारी, संकट तथा पाप से छुड़ाने वाले ईश्वर हैं।
मैं जानता हूँ कि मैं पापी हूँ, और पाप लेकर मैं आपके सामने नहीं आ
सकता और न ही स्वर्ग में रह सकता हूँ। इसलिये मैं अपने पापों से मन
फिराकर आपसे क्षमा मांगता हूँ। कृपया मेरे पापों को माफ कर दीजिये
और मेरे जीवन का नियंत्रण अपने हाथों में ले लीजिये। प्रभु यीशु के
नाम से मांगता हूं। आमीन”
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