संकट में ढाल, शांति का राजकुमार, मेरा प्रभु यीशु – आरती मोदी

पारिवारिक पृष्ठभूमी

मेरा नाम आरती है। मेरा जन्म राजस्थान के एक छोटे से गाँव में सन् 1985 में हुआ और मैं एक ऐसे ब्राह्मण परिवार में जन्मी थी जो कि बहुत मूर्तिपूजा, और कई तरह के अंधविश्वास में आस्था रखता था। ब्राह्मण परिवार में मेरा पालन पोषण होने से मैं हिन्दू रीतिरिवाजों को श्रद्धापूर्वक माना करती थी। मेरी दादी गाँव की औरतों को कथा सुनाती थी, मंदिरों में सुबह-शाम जाया करती था तथा तीर्थयात्राओं में जाती थी। मैंने जब से होश संभाला, तब से मैं भी दादी जी के साथ मंदिरों में, तीर्थयात्राओं में जाने लगी। बहुत पूजापाठ करने लगी। मेरी दादीजी को इतना सबकुछ करते हुए भी कभी शांति नहीं मिली और उनका अशांत जीवन उनके दैनिक व्यवहार हमें कई बार दिखाई देता था। मैं खुद दादीजी के व्यवहार से कई बार दुःखी हुई। मैंने कभी सोचा नहीं कि क्या सच है और क्या झूठ, क्योंकि मैं बहुत छोटी थी। मेरी सोच बहुत सीमित थी।

दुख तथा क्लेश

मैं अपनी मम्मी को हमेशा बहुत दुःखी देखती थी। पापा काम की वजह से हम से दूर दिल्ली में जाकर रहते थे। पापा के पास कोई काम नहीं था। उनके खुद के प्रियजनों ने उनको धोखा दिया। हमें धोखा देने के बावजूद भी वह परिवार अपने घर में यज्ञ करवाते और अपने आपको गायत्री परिवार के सदस्य मानते थे। वो सबके साथ धोखाधड़ी करते थे।

पापा के पास काम न होने की वजह से मम्मी को गाँव में सब जली-कटी सुनाते थे। मम्मी रोज रात को सारे घर का काम खत्म करने के बाद जब कमरे में आती थी तो घंटों तक रोती रहती थी। मुझे और मेरे बड़े भैया को गले लगा कर वो बहुत रोती थी। मेरी मम्मी कई साधू-महाराज तथा संतों के पास पूजापाठ इत्यादि पता नहीं क्या क्या करती रहती थी, कि बस किसी तरह पापा का काम ठीक हो जाये, हमारे जीवन में शांति आ जाये। मगर सिर्फ निराशा के सिवा मम्मी को कुछ भी हाँसिल नहीं हुआ। मम्मी मूर्तियों के आगे बहुत रोती थी लेकिन कुछ नहीं हुआ। मम्मी को देखकर मैं भी मूर्तियों से बातें करती, रोती, प्रार्थना करती कि सब कुछ ठीक हो जाये, मगर जिस निराशा और दुःख के साथ हम मूर्तियों के सामने जाते थे, उसी निराशा के साथ वापस उठ जाते थे। मैं सोचती थी कि कोई हमारी सुन भी रहा है या नहीं।

जब पापा महिने –दो महिने में घर आते तो मैं पापा से कहती रहती – पापा हमें अपने साथ दिल्ली ले जाओ, हम आपके बिना नहीं रह सकते। एक दिन पापा ने तय किया और 1996 में हम सब दिल्ली जाकर एक किराये के एक कमरे में रहने लगे। वहाँ भी हमने कई मुश्किलों का सामना किया। पैसों की कमी की वजह से बहुत परेशानियाँ देखनी पड़ीं। दिल्ली में मेरे ताऊजी और उनका परिवार भी रहता था। ताऊजी आये दिन घर से आकर बहुत कुछ बोल के जाते जिससे हम सब बहुत परेशान हो जाते थे।

नई शुरूआत

फिर पापा-मम्मी ने सोचा कि हम दिल्ली छोड़कर जयपुर चले जाते हैं, वहाँ पर कोई भी काम कर लेंगे पर आराम से रहेंगे मगर जयपुर जाने के लिये मैं बिलकुल तैयार नहीं थी। मैं रोज रोती और मम्मी-पापा से कहती कि हमारे साथ ऐसा क्यों हो रहा है। मैं जो भी कहती थी, पापा-मम्मी मेरी बात मानते थे मगर ये बात कि हम जयपुर नहीं जायें, उन्होंने नहीं मानी और जाने की तैयारी करने लगे।

जयपुर में पापा की मामी जी रहती थीं, पापा ने उनसे कहा कि कोई हमारे लिये किराये का घर देखें, हम सब हमेशा के लिये जयपुर आ रहे हैं। मामीजी ने जयपुर में सोडाला नामक जगह में बहुत घर ढूंढा, मगर कोई भी फाइनल नहीं हुआ। कइयों को एडवांस में पैसे देते थे लेकिन अगले ही दिन वो पैसे वापस कर देते थे और कहते थे कि हमें घर किराये पर नहीं देना है। बाद में, जब जयपुर आने के लिये हमें एक ही दिन बचा था तब मामी जी एक घर गये और उनसे पूछा तो उन्होंने हाँ कर दिया। वो भाई (मकानमालिक) भी नहीं जानते थे कि उन्होंने इतने सस्ते में घर क्यों दिया, वो इतने सस्ते में नहीं देना चाहते थे। परंतु परमेश्वर अपनी योजना के अनुसार काम कर रहा था।

अगली सुबह हम सब पूरे सामान के साथ उस घर में आ गये। हम सबका मन (मेरा, भैया और पापा-मम्मी का) बहुत दुःखी था कि पता नहीं यहाँ सब कुछ कैसा होगा। सन् 2000 में हम दिल्ली से जयपुर आये थे। मैं किसी से बात नहीं करती थी। पापा अपने काम को ठीक करने की कोशिश करने लगे। मैं बहुत परेशान रहती थी। मेरे मामा-मामीजी जो जयपुर में ही रहते थे, मैं उनके घर अक्सर चली जाया करती थी।

एक दिन शुक्रवार को हमारे मकानमालिक (अरूण भैया) के घर पर बहुत से लोग आये और वो सब लोग बहुत जोर-जोर से गाने गा रहे थे। हमें आवाज सुनाई दी तो हम और भी ध्यान से उस आवाज को सुनने की कोशिश करने लगे। हमें ढोलक और गिटार की आवाजें आ रही थी और सब लोग बड़ी आशा भरे गीत गा रहे थे। मैं, मम्मी और भैया जहाँ थे वहीं बैठ गये और उन गीतों को सुनने लगे। उस वक्त हमारे दिलों में कुछ अलग, कुछ नया सा अनुभव होने लगा। उन गानों को सुनकर हम अपने दुःख और परेशानियों को कुछ पल के लिये भूल गये।

अगले दिन सुबह मम्मी ने अरुण भाई की पत्नि (वन्दना जी) से पूछा कि आपके घर कल रात को क्या हो रहा था। इस पर उन्होंने बताया कि वो मसीही विश्वासी थे और चर्च से कुछ लोग हर शुक्रवार को वहाँ आते थे। उन्होंने यह भी बताया कि हम मिलकर प्रभु यीशु मसीह के गीत गाते हैं, बाइबिल पढ़ते हैं और प्रार्थना करते हैं। यह सबकुछ हमारे लिये बिलकुल अलग और नया था। पता नहीं क्यों हम यह सब सुनकर बहुत खुश हुये और उनसे पूछा कि क्या हम भी आपके चर्च में आ सकते हैं। उन्होंने कहा, “ज़रूर। चर्च में कोई भी आ सकता है।”। हमने तय किया कि एक बार हम भी चर्च जाकर देखेंगे।

पहली बार चर्च जाना

इस बीच भैया एक बार अरूण भैया (मकानमालिक) के साथ चर्च गये और फिर वापस आकर मुझे और मम्मी को कहने लगे कि चर्च बहुत अच्छा है। और उन्होंने बताया कि उन्हे चर्च जाकर बहुत अच्छा लगा। इसके बाद मैं पापा से जिद करने लगी कि मुझे भी चर्च ले कर चलो। सिर्फ एक बार मैं चर्च जाना चाहती हूँ। मेरे बहुत जिद करने पर पापा ने कहा, “ठीक है, हम चलते हैं”।

11 नवम्बर 2000 रविवार के दिन मैं और पापा चर्च गये। उस दिन मेरा जन्मदिन भी था। मेरे मन में चल रहा था कि शायद बहुत बड़ी एक कोई इमारत होगी, उसके ऊपर क्रूस का निशान होगा, बहुत शांत वातावरण होगा, पता नहीं लोग कैसे होंगे, हम तो हिंदू हैं, हम चर्च में जायेंगे तो लोग कुछ कहेंगे तो नहीं, वगैरह वगैरह। यह सब विचार अपने मन में लिये मैं पापा के साथ चर्च पहुँची। मगर जैसे ही हम चर्च के पास पहुँचे, तो हमें बहुत जोर जोर से गाने बजाने की आवाजें आने लगी। और थोड़ा पास गये तो देखा कि कई पेड़-पौधों से घिरा हुआ एक छोटा सा घर था, जिसके एक भाग में एक बंद हॉल है, उस हॉल के बाहर बहुत सारी चप्पल-जूते पड़े हुए थे। मैं और पापा अंदर गये और पीछे जाकर खड़े हो गये। वहाँ पर हर कोई एक-दूसरे के लिये प्रार्थना कर रहे थे। बहुत कुछ मुझे समझ में नहीं आ रहा था और मैं अपने चारों ओर देख रही थी। कई लोग ऐसी भाषा में बोल रहे थे जो मेरी समझ से बिलकुल बाहर थी।

चर्च सभा खत्म होने के बाद सारी लड़कियाँ तथा आंटीयाँ मुझसे बड़े प्रेम से मिलने लगी। उन सबसे मिलकर मुझे ऐसा बिल्कुल नहीं लगा कि मैं पहली बार इन सबसे मिल रही हूँ। चर्च के पास्टर अंकल ने मुझे एक बाइबल दी जिसे देखकर मैं सोच रही थी कि इसमें क्या होगा। घर पहुँचकर सब कुछ मैंने मम्मी को बताया और कहा कि चर्च में सबकुछ बहुत ही अच्छा था और मैंने कहा कि अगली बार हम सब मिलकर चर्च जायेंगे। इसके तुरंत बाद ही मैं बाइबल खोलकर बैठ गई और पढ़ने लगी। काफी कुछ तो मुझे समझ में नहीं आ रहा था, फिर भी मुझे इतना तो पता चला कि यीशु मसीह इस संसार में सारी मानव जाति के लिये आये। सिर्फ ईसाईयों के लिये नहीं बल्कि वो सबके लिये आये थे, क्रूस पर हमारे पापों को लेकर उन्होंने अपने प्राण त्याग दिये और तीसरे दिन वो फिर जी उठे। यीशु मसीह ने मृत्यु को हरा दिया – इस बात को जानने के बाद से मेरा विश्वास प्रभु यीशु मसीह में बढ़ने लगा।

मेरा विश्वास और आशिषें
मुझे पता चला कि यीशु मसीह ज़िन्दा हैं, और हम उनसे कुछ भी मांगें या कहें तो वो हमारी ज़रुर सुनेंगे। इसके बाद ईश्वर ने मेरा दिल ऐसा बना दिया कि मैं किसी भी बात पर ज्यादा सवाल-जवाब या बहस नहीं करती थी बल्कि बाइबल में जो भी लिखा है उन सारी बातों को सच मानकर उन पर विश्वास करने लगी। जो कुछ मैंने प्रभु यीशु के बारे में सीखा वो सबकुछ मैं अपने रिश्तेदारों को बताने लगी। मुझे लगा कि जिस तरह से मैंने, मम्मी ने और भैया ने विश्वास किया है वैसे ही मेरे सारे रिश्तेदार भी करेंगे।

मैं पापा के साथ बैठकर यीशु मसीह के बारे में बहुत देर तक बातें किया करती थी। पापा ने मुझे कभी मना नहीं किया लेकिन जैसे ही उन्हें इस बात का आभास हुआ कि मैं पूरी तरह से यीशु मसीह के पीछे जा रही हूँ और मूर्तिपूजा वगैरह छोड़ दिया है तो वो हमारा विरोध करने लगे। उन्होंने हमारा चर्च जाना बंद करा दिया। मुझसे मूर्तियों की पूजा करने पर जोर देने लगे। इस बात से मैं अंदर से बहुत दुःखी हुई और मैं तथा मम्मी मिलकर आँसुओं के साथ पापा के लिये प्रार्थना करने लगे। थोड़े समय के बाद एक प्रार्थना सभा में प्रभु ने पापा के दिल को बदला और पापा ने अपना जीवन प्रभु यीशु मसीह को दे दिया। इस तरह से मेरा पूरा परिवार यीशु मसीह पर विश्वास करने लगा। लेकिन धीरे धीरे पापा के मन में समाज का डर आने लगा, और वो हमसे कहने लगे कि हम अपने परिवारवालों को कैसे कहें और क्या कहें। बहुत सारे सवाल पापा के दिमाग में आने लगे और फिर आस-पड़ोस के लोग पापा से कहने लगे कि शर्मा जी क्या आपने धर्म-परिवर्तन कर लिया है। पापा इन बातों से थोड़ा परेशान हो जाते थे।

जब परमेश्वर (सनातन, मृत्युंजय परम ईश्वर) पर हमने प्रभु यीशु में होकर भरोसा रखा तो वो हमारे साथ विश्वासयोग्य ठहरा। पापा का काम भी ठीक हो गया और भैया को भी एक जगह नौकरी मिल गई। इस प्रकार धीरे धीरे सांसारिक ज़रूरतों का सारा सामान जैसे टी.वी, कम्प्यूटर, मोटरसाइकल इत्यादि कई सारी आशीषों से परमेश्वर हमको भरने लगा। जब हमारे रिश्तेदारों ने देखा तो कहने लगे कि इन्हें पैसे मिले हैं और इन्होंने पैसे लेकर अपना धर्म-परिवर्तन कर लिया है। ये बातें जब हम सुनते तो हमें दुःख भी होता और हँसी भी आती। सबसे बड़ी आशीष जो परमेश्वर ने हमें दी थी, वो है उसी शांति जिसके लिये हम कितने सालों से प्रयत्न कर रहे थे लेकिन यीशु मसीह पर विश्वास करते ही उसकी असीम शांति हमारे परिवार में आ गयी।

और बाइबल कहती है कि यीशु मसीह शांति का राजकुमार है, और सच्ची शांति हमें केवल प्रभु यीशु मसीह में ही मिल सकती है। ऐसी स्थाई तथा अचल शांति मिलने का एकमात्र ज़रिया सिर्फ यीशु हैं, इस बात को हमनें परखकर देखा है।
इन सब बातों के दौरान एक बात मम्मी के दिल में हमेशा रहती थी कि आरती (मेरी) की शादी कैसे होगी, क्योंकि हम कोई पूजा-पाठ नहीं करते तो अगर ऐसे री किसी हिन्दू परिवार में शादी हुई तो बहुत मुश्किल होगी। क्या होगा? कैसे होगा? इन सवालों के साथ मम्मी प्रार्थना करती थी। कुछ समय बाद परमेश्वर ने हमें एक ऐसे परिवार से मिलाया जो मोदी (जैन) हैं, मगर प्रभु यीशु मसीह पर विश्वास करते हैं। हम जान गये कि यह मिलन परमेश्वर की ओर से था और दोनों ही परिवार इस रिश्ते से खुश थे।

सताव
परंतु जैसे ही हमारे रिश्तेदारों को पता चला कि मेरी शादी की बात हो रही है और उन्हें गलतफहमी हुई की मेरी शादी किसी ईसाई से हो रही है। हमनें उनसे बात की लेकिन मेरी दादीजी, ताऊजी, चाचाजी आदि सारा परिवार हमारे घर आ गये और हमसे पूछ-ताछ करने लगे कि तुम्हारे घर का मंदिर कहाँ है। हमने सारी बातें उनको विस्तार से बताई, उन्हें प्रभु यीशु मसीह के बारे में भी बताया लेकिन वो सब हमारे विरोध में खड़ो हो गये। 1 सप्ताह तक सब लोग हमारे घर में ही रहे और हम पर ज़ोर डालते रहे कि हम फिर हिंदू धर्म में आ जायें (जिसको हमने त्यागा भी नहीं था और न ही धर्म परिवर्तन किया था अपितु हमारा तो विश्वास तथा जीवन का परिवर्तन हुआ था), मूर्तिपूजा करें। परमेश्वर ने हमें सामर्थ दिया जिसके द्वारा मेरे पापा ने उन सबको अपना आखिरी फैंसला सुनाया की हम केवल प्रभु यीशु मसीह के सामने ही झुकेंगे और किसी मूर्ति के सामने नहीं।

इसके बाद वो हम पर और ज्यादा जोर जबरदस्ती करने लगे, हमें गालियाँ देने लगे, हमें जान से मार डालने की धमकियाँ देने लगे, हमारा मजाक उड़ाने लगे। वो हमारे ही घर में रहते रहे और हमें एक किनारे धकेल दिया। हमें समझ नहीं आ रहा था कि यह एकदम से हमारे साथ क्या हो रहा है। परमेश्वर इस परिस्थिति में भी अपने वचन के द्वारा हमें बल देता था जिससे उसकी शांति हमारे अंदर बनी रहती थी।

एक दिन उन्होंने मुझे और मम्मी को ज़बरदस्ती दिल्ली ले जाने की योजना बनाई। पापा ने हस्तक्षेप भी किया पर उन्होंने पापा को और भैया के वहीं रहने दिया और (लगभग अपहरण जैसी परिस्थिति में) हमें दिल्ली ले गये। 7-8 दिनों के लिये उन्होंने बहुत सारी योजनायें बनाई थी कि वो हमें फिर से मूर्ति-पूजा करने पर जोर देंगे और किसी अविश्वासी हिंदू व्यक्ति से मेरी शादी करा देंगे। जयपुर में परमेश्वर ने पापा से अपने वचन के द्वारा बात की और पापा अगले ही दिन दिल्ली पहुँच गये और हमें सबके विरोध के बावजूद हमें वापस जयपुर ले आये। जयपुर पहुँचने के बाद फिर से मेरे मामाजी हमारी जासूसी करने लगे ताकि हम चर्च न जा सके। वो हमें चर्च जाने से रोकते थे, किसी भी विश्वासी भाई-बहिन से हमें बात नहीं करने देते थे। इस सब के बावजूद हमारा विश्वास कभी कम नहीं हुआ (बल्कि इस सताव नें हमारे विश्वास को और बढ़ाया ही है)। वे सब सोचते थे कि हम लोग इतने ढीठ कैसे हो गये कि उनकी किसी भी बात का हम पर कोई असर ही नहीं हो रहा था। कितने ही समय वे हमारे ही घर में रहकर हमारा जीना दूभर करते रहे, परंतु, आखिरकार, थकहार कर वो सब एक एक कर अपने अपने घर चले गये। केवल परमेश्वर की सामर्थ के कारण हम चारों विश्वास में दृढ़ता से खड़े रहे।

परमेश्वर की सुऱक्षा और शांति
थोड़े दिनों के बाद मेरे सबसे छोटो चाचाजी गलत इरादे से हमारे घर आना चाहते थे। उन्होंने पापा को फोन किया कि मैं आ रहा हूँ, आप कहीं जाना नहीं। पापा ने उनसे कहा कि आ जाओ, हम घर पर ही हैं। पापा-मम्मी को थोड़ा डर भी लगा कि वो रात के समय क्यों आ रहे हैं। पापा, मम्मी और भैया उनका इंतज़ार करते रहे, अचानक परमेश्वर ने तीनों को मीठी शांतिमय नींद में डाल दिया। तीनों एक साथ अपनी अपनी जगह पर गहरी नींद में आराम से सो गये क्योंकि कई दिनों से कोई भी सो नहीं पा रहा था। सुबह जब सब की नींद खुली तो देखा कि चाचाजी तो आये ही नहीं।

पापा ने चाचाजी को फोन किया और ना आने का कारण पूछा तो चाचाजी ने कहा कि मैं तो आया था मगर आपके घर के आगे 7-8 बड़े बड़े आदमी खड़े थे जिन्होंने मुझे अंदर आने ही नहीं दिया। यहाँ तक कि मैं दरवाजे की घंटी बजाने के लिये वहाँ तक भी नहीं पहुँच पाया।

इतना सुनते ही पापा, मम्मी और भैया सबके अंदर से डर निकल गया और सबने परमेश्वर का धन्यवाद किया। हमने अपनी सुरक्षा के लिये किसी को नहीं लगाया था परंतु प्रभु यीशु ने अपने स्वर्गदूतों को भेजकर हम सबकी रक्षा की। परमेश्वर का प्यार अनोखा है, प्रभु अपने हर बच्चे को जो उस पर विश्वास करता है, उसे अपनी सुऱक्षा देता है। कोई भी उसे छू नहीं सकता। इस प्रकार मेरी शादी भी मोदी परिवार में ही बहुत अच्छी तरह से हो गई। आज मैं अपने पति सुनिल मोदी तथा अपने बच्चों के साथ खुश हूँ। हम सब प्रभु की संगति में शांति और आनंद से भरपूर जीवन जी रहे हैं।

हमने जान लिया है कि यीशु मसीह परम सत्य हैं। उद्धार (मुक्ति) तथा पापक्षमा हमें केवल यीशु मसीह के द्वारा ही मिल सकती है। मोक्ष-मार्ग दिखाने वाले और सच्ची शांति देने वाले प्रभु यीशु पर आप भी विश्वास कर सकते हैं (भले ही आप किसी भी धर्म अथवा पंथ के मानने वाले क्यों न हों, और आपकी परिस्थिति कैसी भी विकट क्यों न हों)। अगर आपको हमारी इस जीवन-साक्षी से बल मिला है तो आप हमसे संपर्क कर सकते हैं। आपके विश्वास के अनुसार प्रभु आपको भी आशीष दें।

यदि आप अभी से विश्वास कर प्रभु को अपना जीवनदाता, मुक्तिदाता स्वीकार करना चाहते हैं तो ये प्रार्थना सच्चे मन से करें –

“प्रभु यीशु, मैंने आज जाना है कि आप जीवित ईश्वर हैं, जो पाप-क्षमा करते हैं, सच्ची शांति देते हैं और सदैव अपने भक्तों के संग रहते हैं। मैं अपने पापों से पश्चाताप करता हूँ और आपसे प्रार्थना करता हूं, कि मेरे पाप क्षमा कर मेरे मुक्तिदाता बन जाइये। अपनी शांति और अपना जीवन आप मुझे भी प्रदान करें। मैं आज से आपको अपना उद्धारकर्ता मानता हूँ और अपना सर्वस्व आपके लिये समर्पित करता हूँ। मेरी सहायता करें, अपनी सच्ची शांति दें ताकि आगे का सारा जीवन आपके वचनों के अनुसार बिता सकूँ। मेरी प्रार्थना को सुनने के लिये आपका धन्यवाद। प्रभु यीशु के नाम से मांगता/मांगती हूँ।”


 

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 "Anyone who believes in the Son of God has this testimony in his heart..."

[1 John 5:10]