प्रभु की स्तुति हो
मैं खुदावंद का शुक्र अदा करता हूँ कि उसने मुझे जिन्दों की ज़मीन
पर रखा हुआ है। मेरा ताल्लुक पाकिस्तान से है। मैं एक मसीही घराने
में पैदा हुआ। मेरे माता-पिता शुरू से ही मज़हब के बारे में कड़क
थे। संडे स्कूल जाना, चर्च जाना, और मसीह के कामों में हमेशा आगे
आगे रहना, उनके लिये हमेशा से पहला स्थान था। खुदा का लाख लाख
शुक्र करता हूँ कि मुझे इतने अच्छे माता पिता दिये। बचपन से लेकर
कॉलेज के जीवन तक मैं हमेशा अपने को अलग महसूस करता रहा हूँ। शुरू
से हमेशा हर बात के लिये दुआ करते रहना हमारी फ़ितरत में आ गया था
जिससे अपने भविष्य के लिये हम हमेशा दुआ किया करते थे। मैं हमेशा
से खुदावंद का डर तो मानता था पर फिर भी मुझसे गलतियाँ भी हुईं।
कॉलेज की पढ़ाई खत्म होने के बाद मुझे संगीत सीखने का बड़ा शौक था।
बचपन से लेकर मैं चर्च में तबला और हारमोनियम बजाता था पर कॉलेज
में आकर मुझे गिटार सीखने और बजाने का चस्खा लगा। उन्हीं दिनों में
खुदा ने मुझे एक बड़े हादसे में बचाया। खुदा ने मुझे दिखाया कि वो
है और मुझे उसको वैसा पहचानना है जैसा वो है। अब भी मैं कई बार
सोचता हूँ कि उसे मुझसे कैसा प्यार था जो उसने मेरे लिये ऐसा किया।
खुदा ने न सिर्फ मुझे बल्कि मेरे पूरे परिवार को बड़े खतरे से
बचाया।
वो साल 2001 का एक संडे का दिन था। जब सभा लगभग खत्म होने को थी।
आखिरी गीत चल रहा था और पास्टर साहब दरवाज़े की ओर चले। तभी चंद
लोग (5-7) बन्दूकें लेकर चर्च में घुसे और उन्होंने पास्टर को अपनी
बाइबल फ़ैंक देने के लिये बोला। पास्टर ने जब मना किया तो उन्होंने
उनके माथे पर गोली मार दी। पास्टर उसी समय गिर पड़े और खुदा के पास
चले गये। फ़िर उन लोगों ने फायरिंग शुरू कर दी। उस दिन लगभग 35-40
लोग चर्च में थे। मैं और मेरा परिवार भी आगे की ओर बैठे थे। जब
हमने फायरिंग का शोर सुना तो हम आगे की ओर भागने लगे। मैं और मेरे
बड़े भाई साथ में थे और बाकि परिवार जन कहाँ थे वो मुझे नहीं पता,
शायद वो दूसरे दरवाज़े से बाहर निकल गये थे। एक व्यक्ति बंदूक लेकर
हमारे पीछे आया और मुझ पर और मेरे भाई पर गोलियाँ चलाने लगा। मैंने
भाई को धक्का दिया तो दूर जाकर गिर पड़ा। और मैं भी भागकर एक
चबूतरे के पास जाकर छुप गया। उसने मेरी तरफ काफी गोलियाँ चलाई और
थोड़ी देर बाद वो यह समझकर कि मैं मर गया, वो चला गया। कुछ देर बाद
एक दम सन्नाटा सा हो गया, गोलियाँ चलनी बंद हो गई थीं। मैं उस ओर
दौड़ा जहाँ मेरी माँ और संड़े स्कूल टीचर बैठी थीं। मेरी माँ तो
मुझे वहाँ नहीं मिली पर मैंने अपनी संडे स्कूल टीचर को वहाँ
लहुलूहान पड़े देखा। उनको काफी गोलियाँ लगी थीं। मैंने उनको सहारा
देने की कोशिश की ताकि उनको बाहर ले जा सकूँ, पर उन्होंने मुझे कहा
कि मैं अपने आप को बचाऊँ और उन्होने मुझे वहाँ से भेज दिया। उसके
बाद से लेकर आज तक मैंने उनको कभी नहीं देखा। बचपन से लेकर
जिन्होंने मुझे ईश्वर और उसके प्रेम के बारे में सिखाया, वो मेरी
नज़रो के सामने दम तोड़ रही थी और मैं कुछ नहीं कर सकता था।
उन्होने मुझे जाने के लिये बोला और मैं वहाँ से चला गया। मैं जब
वहाँ से चला तो वो लोग फिर मुझ पर गोलियाँ चलाने लगे, पर मैं बहुत
डरा हुआ नहीं था। मुझे मेरे कानों में गोलियों के चलने की साँय
साँय आवाज आ रही थी। जब मैं बाहर गया तो मैंने देखा कि मेरे पिता
मुझे ही खोज रहे थे। हमारा पूरा परिवार, पास्टर की पत्नि, उनकी
छोटी सी बेटी और 3 और लोग बच गये थे। इसके अलावा बहुत से लोग
ज़ख्मी हो गये थे। बाकि सब लोग या तो मर गये थे या बहुत बुरी तरह
ज़ख्मी थे और उन्होंने थोड़ी देर बाद दम तोड़ दिया। बंदूक चलाने
वाले जब चले गये तो हम चर्च के अन्दर गये और हमने बहुत सी लाशें
देखी। बहुत से लोग जो हमारे साथ आराधना करते थे वो इस दुनिया को
छोड़ कर चले गये थे। मैंने पास्टर को देखा, वो ज़मीन पर पड़े थे और
उनकी बाइबल उनके सीने से लगी हुई थी।
मेरे भाई ने देखा की मुझे खून आ रहा था। उसने मेरे पैरों के नीचे
गिरे खून को देखकर मुझे देखा और पाया की मेरे पीठ से और कुछ जगहों
से खून निकल रहा था। मुझे हालांकि दर्द नहीं हो रहा था परंतु वो
लोग अस्पताल लेकर गये। वहाँ मेरा एक्स-रे किया गया तो डॉक्टर ने
बताया कि दो गोलियाँ मुझे छूकर निकली थीं जिनसे मेरी पीठ की हड्डी
ज़ख्मी हुई थीं। बाद में मेरी शर्ट को देखकर उन लोगों ने बोला की
6-8 गोलियाँ मेरे कपड़ों में से निकली थीं, पर उनसे मुझे चोट नहीं
लगी थी। मेरे बेल्ट की हुक भी पीछे से फ़ट गई थीं। पर खुदावंद ने
मुझे ऐसे बचा लिया जैसे कि कुछ हुआ ही नहीं था। इस हादसे ने खुदा
में मेरे ईमान को बहुत बल दिया और मेरा विश्वासी जीवन बदल गया।
मैंने उसके जीवित सामर्थ को देखा था। मैं अब भी अपनी आंटी (संडे
स्कूल टीचर) को बहुत याद करता हूँ। वो एक एक बच्चे से प्यार करती
थीं और कहती थीं की जब मैं एक लड़का या लड़की को विश्वास में तैयार
करती हूँ तो एक इंसान नहीं एक एक खानदान को तैयार करती हूँ।
उन्होंने मेरे जीवन पर बहुत प्रभाव डाला था।
2005 में मैं विश्वासी कलीसिया का भाग बना और मैंने अपने गुनाहों
की माफी मांग कर प्रभु यीशु को अपना उद्धारकर्ता मानकर ग्रहण किया।
अब मैं खुदावंद यीशु में नज़ात पा चुका हूँ। मेरे मन में अब एक ही
बात बार बार आती है कि अपने उस खुदा को जो हमसे प्यार करता है,
हमें बचाने के लिये जो इंसान बनकर आ गया, मारा गया, गाड़ा गया, जी
उठी, ज़िन्दा स्वर्ग में उठा लिया गया और अब भी हमारा ख्याल रखता
है और हमारे साथ साथ रहता है, उसके बारे में सबको बताऊँ। संगीत का
जो गुण परमेश्वर ने मुझे दिया है उसे मैं उसकी महिमा के लिये
इस्तेमाल करता हूँ और उसी के लिये जीना चाहता हूँ। अब मैं चर्च में
आराधना और संगति में अगुवाई करता हूँ। मेरा विश्वास है कि आने वाले
दिनों में वो मुझे अपने पाक रूह का मस्सा देकर इस्तेमाल करेगा।
अगर आप को मेरी गवाही से परमेश्वर पर विश्वास हुआ है तो आप उससे
अपने गुनाहों की माफ़ी मांग लें, उसके बलिदान के लिये जो आपके लिये
भी किया गया, विश्वास करें, प्रभु यीशु को अपने जीवन में सबसे पहला
स्थान दें, उसके वचन को पढ़ना शुरू करें और एक विश्वासी संगति में
जायें, ताकि खुदावंद आपको बरकत दे, नज़ात दे और स्वर्ग के जीवन के
लिये आपका नाम जीवन कि किताब में लिख दें। प्रभु आपको आशीष दें।
आमीन।
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