लेख
प्रभु अपने परमेश्वर से मन, प्राण
तथा बुद्धी से प्रेम रख |
बृजेश चोरोटिया
इस वचन का क्या
अभिप्राय है? ईश्वर से मन, प्राण तथा बुद्धी से प्रेम करना क्या
होता है? संक्षेप में कहें, तो दिल हमारी भावनाओं का प्रतीक है,
प्राण हमारी इच्छा तथा मन का, तथा बुद्धी परिस्थिति तथा समझ के
आधार पर हमारी निर्णय लेने की क्षमता का। तो क्या ? ईश्वर से प्रेम
करने में इन बातों का क्या योगदान है?
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क्या आप पहलवान,
मुक्केबाज अथवा सैनिक हैं |
बृजेश चोरोटिया
मुख्यतया जब हम लड़ाई शब्द सुनते
हैं तो हमारे मन में सर्वप्रथम जो तस्वीर बनती है, वह ऐसी होती है
जिसमें हमें ऊँची आवाज में बात करते लोग, शारीरिक रूप से
धक्का-मुक्की तथा गाली-गलौच के बारे में सोचने लगते हैं। बाइबल में
'फाइट' शब्द को कुश्ती लिखा है जो कि फिर भी हमें थोड़ा परिष्कृत
लगता है परंतु क्या सच में सभी तरह की लड़ाई अथवा कुश्ती गलत होती
हैं?
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आदरणीय पाप |
बृजेश चोरोटिया
क्या
कोई पाप आदरणीय भी हो सकते हैं? नहीं, कोई पाप आदरणीय नहीं होते
परंतु हमने ऐसे पापों को आदरणीय पापों की श्रेणी में रखा है जो
हमारे जीवन में तो हैं परंतु हम उनकी ओर ध्यान नहीं देते और इसीलिये
न उनके लिये माफी मांगते हैं और न ही उनसे दूर होते हैं। परमेश्वर
का वचन बताता है कि यदि कोई ऐसी चीज़ है जो हमारी प्रार्थनाओं को
ईश्वर तक पहुँचने से रोक सकती है तो वो हमारे पाप ही हैं...
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