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आखिरी बार आपने कब अपने जीवन के सत्य के बारे में विचार किया था? कब आपने मोक्ष, सत्य, जीवन, मृत्यु, धर्म आदि के बारे में विचार किया था?

  • मोक्ष क्या है?
  • परमसत्य क्या है?
  • क्या सभी धर्म समान हैं?
  • क्या सभी मार्ग एक ही ईश्वर की ओर जाते हैं?
  • क्या हम अपने भले कर्मों (पुण्य) से मोक्ष पा सकते हैं?
  • मौत के बाद क्या होता है?
  • हमारा अस्तित्व क्यों है?

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असतो मा सदगमया प्रार्थना ईश्वर को पुकार सत्य, मार्ग और जीवन

परिवर्तन की एक प्रार्थना, जो बचपन से मैंने सीखी थी वो इस प्रकार है -

असतो मा सदगमया,
तमसो मा ज्योतिर्गमया,
मृत्योर्मां अमृतं गमया।।

 ये प्रार्थना मैंने बचपन में अपने स्कूल की डायरी में कई बार पढ़ी थी जिसका अर्थ इस प्रकार लिखा था हे ईश्वर, मुझे असत्य (झूठ) से सत्य की ओर, तमस (अंधेरे) से प्रकाश की ओर तथा मृत्यु से जीवन की ओर लेकर जाएँ। इस अर्थ को मैंने कई बार पढ़ा था परंतु फ़िर भी इसका उत्तर मेरे पास नहीं था।

इस प्रार्थना का उत्तर मुझे तब ही मिला जब मैंने यीशु मसीह को जाना। प्रभु यीशु को जानने के बाद मुझे पता चला कि उनके नाम में की गई हमारी हरेक प्रार्थना परमेश्वर जरूर सुनता है और उनका उत्तर भी देता है उसकी अपरम्पार दया में हाँ, या उसकी असीमित बुद्धि और ज्ञान में हमारे भले-बुरे को जानते हुए नहीं। सच्चे परमेश्वर के नाम से की गई कोई भी हमारी प्रार्थना व्यर्थ नहीं जाती।

यदि उपरोक्त प्रार्थना सच्चे मन से, सच्चे परमेश्वर से की गई हो तो इस प्रार्थना का उत्तर मिलना आवश्यक है । परमेश्वर मानवजाति से प्रेम करता है इसलिए उपनिषद की इस प्रार्थना का जवाब, परमेश्वर के वचन, बाइबल में मिलता है- 

 ...मार्ग और सत्य और जीवन मैं ही हूँ; बिना मेरे द्वारा कोई परमेश्वर तक नहीं पहुँच सकता

[युहन्ना 14:6]

  मैं तुमसे सच सच कहता हूँ, जो मेरा वचन सुनकर मेरे भेजने वाले पर विश्वास करता है, अनन्त जीवन उसका है; और उस पर दण्ड की आज्ञा नहीं होती परन्तु वह मृत्यु से पार होकर जीवन में प्रवेश कर चुका है।

 [युहन्ना 5:24]

  यीशु ने फिर लोगों से कहा, जगत की ज्योति मैं हूँ; जो मेरे पीछे हो लेगा वह अन्धकार में न चलेगा, परन्तु जीवन की ज्योति पाएगा।

[युहन्ना 8:12]

एक और प्रार्थना के विषय में मैं आपको बताता हूँ गायत्री मंत्र

 ॐ भूर्भुवः स्वः
तत्सवितुर्वरेण्यं
भर्गो देवस्य धीमहि
धियो योनः प्रचोदयात्।

आत्मिक वचन
 
 आदरणीय पाप
चिंता, भय, झुंझलाना...

क्या कोई पाप आदरणीय भी हो सकते हैं? नहीं, कोई पाप आदरणीय नहीं होते परंतु हमने ऐसे पापों को आदरणीय पापों की श्रेणी में रखा है जो हमारे जीवन में तो हैं परंतु हम उनकी ओर ध्यान नहीं देते और इसीलिये न उनके लिये माफी मांगते हैं और न ही उनसे दूर होते हैं। ....

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 जिसका मतलब (भावार्थ) होता है ओ बृहमांड के सृष्टिकर्ता परमेश्वर, हम आपकी असीम महिमा पर ध्यान धरते हैं। ऐसा होने दे कि आपकी वैभवमयी सामर्थ्य हमारी बुद्धि को प्रकाशित करे, हमारे पापों को क्षमा करे तथा सही मार्ग में हमारा पथ प्रदर्शन करें।

 सदियों से मानव सत्य, शांति तथा सार्थक जीवन की खोज करता रहा है। यही खोज इस प्रार्थना के रूप में इस मंत्र में निकलती है, परंतु साथ ही ये बात समझने की भी ज़रूरत है कि यह प्रार्थना सृष्टिकर्ता परमेश्वर से की गई है, इसलिये इसका उत्तर सिर्फ़ जीवित अमूर्त प्रेमी सृष्टिकर्ता परमेश्वर की ओर से ही आ सकता है।

 यदि इस प्रार्थना को ही हम गौर से देखें तो हम समझ सकते हैं कि  बाइबल में इस प्रार्थना का भी उत्तर है

  • यह प्रार्थना सृष्टिकर्ता परमेश्वर से है और सच में हमें हमारे रचनाकार परमेश्वर से ही दुआ करनी चाहिए। बाइबल  बताती है कि सच्चा सृष्टिकर्ता ईश्वर कौन है यीशु मसीह। (युहन्ना 1:1, 1:3, 1:14)
  • यह प्रार्थना बुद्धि प्राप्ति, सत्य प्रकाशन, पाप क्षमा तथा सत्य मार्ग दिखाने के लिये है य़ीशु मसीह ने कहा कि सत्य, मार्ग और जीवन वो खुद हैं (युहन्ना 14:6) जो परमेश्वर के पुत्र हैं, खुद ज्योति हैं (युहन्ना 8:12) जो कि मानव रूप में धरती पर आए ताकि हमें स्वयं अपना प्रकाश दें, हमारे पापों की क्षमा करें और हमारे लिए शांति तथा उद्धार का मार्ग प्रशस्त करें (युहन्ना 3:16,17)।

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