|
परिवर्तन की एक
प्रार्थना, जो बचपन से मैंने सीखी थी वो इस प्रकार है -
असतो मा सदगमया, तमसो मा
ज्योतिर्गमया, मृत्योर्मां अमृतं
गमया।।
ये
प्रार्थना मैंने बचपन में अपने स्कूल की डायरी में कई बार पढ़ी थी
जिसका अर्थ इस प्रकार लिखा था
–
हे ईश्वर, मुझे असत्य (झूठ) से सत्य की ओर, तमस (अंधेरे) से प्रकाश
की ओर तथा मृत्यु से जीवन की ओर लेकर जाएँ। इस अर्थ को मैंने कई
बार पढ़ा था परंतु फ़िर भी इसका उत्तर मेरे पास नहीं था।
इस प्रार्थना का
उत्तर मुझे तब ही मिला जब मैंने यीशु मसीह को जाना। प्रभु यीशु को
जानने के बाद मुझे पता चला कि उनके नाम में की गई हमारी हरेक
प्रार्थना परमेश्वर जरूर सुनता है और उनका उत्तर भी देता है
–
उसकी अपरम्पार दया में
‘हाँ’,
या उसकी असीमित बुद्धि और ज्ञान में हमारे भले-बुरे को जानते हुए
‘नहीं’।
सच्चे परमेश्वर के नाम से की गई कोई भी हमारी प्रार्थना व्यर्थ
नहीं जाती।
यदि उपरोक्त
प्रार्थना सच्चे मन से, सच्चे परमेश्वर से की गई हो तो इस
प्रार्थना का उत्तर मिलना आवश्यक है । परमेश्वर मानवजाति से प्रेम
करता है इसलिए उपनिषद की इस प्रार्थना का जवाब, परमेश्वर के वचन,
बाइबल में मिलता है-
“...मार्ग
और सत्य और जीवन मैं ही हूँ;
बिना मेरे द्वारा कोई परमेश्वर तक नहीं पहुँच सकता”
[युहन्ना
14:6]
“मैं
तुमसे सच सच कहता हूँ, जो मेरा वचन सुनकर मेरे भेजने वाले पर
विश्वास करता है, अनन्त जीवन उसका है;
और उस पर दण्ड की आज्ञा नहीं होती परन्तु वह मृत्यु से पार
होकर जीवन में प्रवेश कर चुका है।”
[युहन्ना
5:24]
“यीशु ने फिर
लोगों से कहा, “जगत
की ज्योति मैं हूँ;
जो मेरे पीछे हो लेगा वह अन्धकार में न चलेगा, परन्तु जीवन की
ज्योति पाएगा।”
[युहन्ना
8:12]
एक और प्रार्थना के
विषय में मैं आपको बताता हूँ
–
गायत्री मंत्र
ॐ
भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य
धीमहि धियो योनः
प्रचोदयात्।
|