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संगति व सहभागिता का वास्तविक अर्थ

संगति व सहभागिता का वास्तविक अर्थ

गिरिजेश वर्मा

“संगति” और “सहभागिता” – आमतौर पर ये शब्द हमें किसी प्रार्थना भवन में इकट्ठे हुए विश्वासियों द्वारा हो रही आराधना या सामूहिक रूप से हो रही आत्मिक सभा की याद दिलाते हैं। सत्य से परे, सामूहिक आराधना “संगति” के मात्र बाहरी और सांसारिक अर्थ को ही दर्शाता है। इस अधूरी तस्वीर में आत्मिक सौन्दर्य का भाव नज़र नही आता है। जैसे आप किसी किताब के कवर को देखकर उस किताब के संदेश का अनुमान तब तक नहीं लगा सकते जब तक आप उस किताब को पढ़ न ले, ऐसे ही एक सामूहिक आराधना को देखकर सहभागिता के होने का अनुमान लगाना भी असंभव सा है।

आजकल ज्यादातर कलीसियाओं में संगति का अर्थ केवल किसी प्रार्थना सभा में शामिल होना, सामूहिक रुप से प्रभु की आराधना करना और एक दूसरे से हाथ मिलाकर “जय मसीह की” कहना ही समझ लिया जाता है। बहुत सी कलिसियाएं ऊपर बताये गए संगति के बाहरी रूप से तो परिचित हैं लेकिन उस संगति में विद्यमान सहभागिता के महत्व से अनजान है। बिना सहभागिता के संगति ठीक वैसे ही मृत अवस्था में है जैसे एक शरीर बिना किसी आत्मा के।

परमेश्वर का वचन “संगति” और ‘सहभागिता’ के महत्व को बहुत ही गहराई से बताता है | बाइबिल की प्रथम पुस्तक उत्पत्ति में देखें तो ईश्वरत्व में एक सहभागिता दिखाई पड़ती है – पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा – त्रियेक्या में एकता के रूप में एक सहभागिता है – “फिर परमेश्वर ने कहा, हम मनुष्य को अपने स्वरूप के अनुसार अपनी समानता में बनाएं” – उत्त्पत्ति 1:26(अ)

प्रथम सदी में शुरूआती कलीसिया के निर्माण के समय की बात करें तो उस समय की कलीसिया शिक्षा पाने, संगति रखने, रोटी तोड़ने और प्रार्थना करने में लौलीन रहती थी (प्रेरितों के काम 2:42), जिसे हम मसीही जीवन के चार महत्वपूर्ण स्तंभ कह सकते है। इनमें “संगति रखना” एक बहुत जरूरी अंग है। वहीं आगे चलकर उस संगति में आपसी सहभागिता भी हमें देखने को मिलती है – सब विश्वास करनेवाले इकट्ठे रहते थे, और उनकी सब वस्तुएँ साझे की थीं। और वे अपनी-अपनी सम्पत्ति और सामान बेच-बेचकर जैसी जिसकी आवश्यकता होती थी बाँट दिया करते थे। और वे प्रतिदिन एक मन होकर मन्दिर में इकट्ठे होते थे, और घर-घर रोटी तोड़ते हुए आनन्द और मन की सिधाई से भोजन किया करते थे।”- प्रेरितों के काम 2:44-46।

परमेश्वर का वचन संगति को दो अलग-अलग से रूप प्रस्तुत करता है –

  • सर्वशक्तिमान परमेश्वर के साथ, जिसमें प्रभु यीशु की सहभागिता द्वारा प्रभु हमें अपने साथ संगति में आमंत्रित करते है- परमेश्वर सच्चा है; जिस ने तुम को अपने पुत्र हमारे प्रभु यीशु मसीह की संगति में बुलाया है। 1 कुरिन्थियों 1:9, और दूसरी
  • हमारी सहभागिता अपने विश्वासी भाई और बहनों के साथ

ध्यान देने की बात ये है कि मसीही जीवन जीने के लिए हमारे जीवन में दोनों बातों का होना ज़रुरी है। उदाहरण के लिये ‘संगति’ व ‘सहभागिता’ को आप अपने दोनों पैरों की तरह समझ सकते है। जिस प्रकार ठीक तरह से चलने के लिए दोनों पैरों का होना ज़रूरी है उसी तरह आत्मिक जीवन में संगति व सहभागिता, दोनों का होना अवश्य है।

क्या आप अपना बाकी का जीवन एक पैर पर विकलांग होकर बिताना चाहेंगे?

बिलकुल नही, ठीक इसी तरह से परमेश्वर भी हमारे आत्मिक जीवन में किसी भी प्रकार की विकलांगता नही चाहते हैं। परमेश्वर हमें अपनी देह अर्थात् कलीसिया में सम्पूर्ण होता देखना चाहते है। जैसा की हम ‘प्रेरितों के काम’ की पुस्तक में देखते हैं – और विश्वास करने वालों की मण्डली एक चित्त और एक मन के थे यहां तक कि कोई भी अपनी सम्पति अपनी नहीं कहता था, परन्तु सब कुछ साझे का था- प्रेरितों के काम 4:32।

याकूब भी अपनी पत्री में विश्वास के साथ साथ हमें आपसी सहभागिता के लिए प्रोत्साहित करता है – यदि कोई भाई या बहिन नगें उघाड़े हों, और उन्हें प्रति दिन भोजन की घटी हो। और तुम में से कोई उन से कहे, कुशल से जाओ, तुम गरम रहो और तृप्त रहो; पर जो वस्तुएं देह के लिये आवश्यक हैं वह उन्हें न दे, तो क्या लाभ? याकूब 2:15-16

प्रेरितों के काम 5:1-11 हनन्याह और सफीरा के बारे में पढ़ते हुए हमें ऐसा लग सकता है जैसे उन्होंने कोई बड़ा पाप नही किया था जिसके कारण उन्हें मृत्युदंड की सजा मिलनी चाहिये, परंतु परमेश्वर चाहते थे की आरम्भिक कलीसिया संगति और सहभागिता के महत्व को बहुत ही गंभीरता से समझे और हरेक प्रकार के दिखावे से दूर रहे।

जो कुछ हम ने देखा और सुना है उसका समाचार तुम्हें भी देते हैं, इसलिये कि तुम भी हमारे साथ सहभागी हो; और हमारी यह सहभागिता पिता के साथ, और उसके पुत्र यीशु मसीह के साथ है-1 यूहन्ना 1:3

परमेश्वर न केवल हमारी व्यक्तिगत संगति चाहते है बल्कि हमारी आपसी संगति और सहभागिता भी चाहते है जिसके द्वारा मसीह की देह (कलीसिया) सम्पूर्ण होती है।

आपके मन में ये सवाल आ सकता है की परमेश्वर के पास संगति करने के लिए और उसकी सेवा टहल के लिए बहुत सारे स्वर्गदूत हैं, तो फिर क्यों प्रभु ने मनुष्य को अपने साथ संगति के लिए बनाया है?

फिर परमेश्वर ने कहा, हम मनुष्य को अपने स्वरूप के अनुसार अपनी समानता में बनाएं उत्पत्ति 1:26 (अ)-

संक्षेप में कहूँ तो परमेश्वर चाहते हैं की हम उस परमेश्वर को जानें जिसने हमें बनाया है। परमेश्वर चाहते हैं कि हम उनसे प्रेम करे और उससे भी बढ़कर उनके साथ संगति करें। परमेश्वर की इच्छा है कि हम उसके महिमामय स्वरूप को संसार में प्रकट करें- हर एक को जो मेरा कहलाता है, जिस को मैं ने अपनी महिमा के लिये सृजा, जिस को मैं ने रचा और बनाया है- यशायाह 43:7।

परमेश्वर के साथ संगति हमें दिन प्रतिदिन प्रभु यीशु के रूप और स्वभाव में रूपांतरित करती है – जैसा मसीह यीशु का स्वभाव था वैसा ही तुम्हारा भी स्वभाव हो -फिलीप्पियो 2:5। दूसरों के साथ संगति हमें प्रभु यीशु के स्वभाव को प्रकट करने का अवसर देती है। हम दूसरों की सहायता कर सकते हैं, उनके लिए प्रार्थना कर सकते हैं – ठीक वैसे ही जैसे प्रभु यीशु करते थे। मसीही जीवन हमें दूसरों के दुःख-सुख में सहभागी होने के लिये प्रेरणा देता है।

आनन्द करने वालों के साथ आनन्द करो; और रोने वालों के साथ रोओ- रोमियों 12:15 – जैसे यीशु लाज़रस की मृत्यु पर अपना शोक व्यक्त करते है। संगति हमें आत्मकेंद्रित होने से रोकती है और हमें परमेश्वर की देह में सम्पूर्ण बनाती है।

हर एक अपनी ही हित की नहीं, वरन दूसरों के हित की भी चिन्ता करे (फिलीप्पियो 2:4)

तुम एक दूसरे के भार उठाओ, और इस प्रकार मसीह की व्यवस्था को पूरी करो (गलतियों 6:2)

संगति हमें नम्र बनाती है। विचित्र बात है कि इस बात को जानते हुए भी बहुत से लोग अपने आत्मिक जीवन में सहभागिता नही रखते हैं। अवश्य है कि आप अपने सगे भाई-बहिनों की तरह एक दूसरे को ह्रदय से प्यार करे | हर व्यक्ति दुसरो को अपने से श्रेष्ठ मानें – रोमियों 12:10।

सबसे महत्वपूर्ण बात जिसके बिना पूरा मसीही जीवन खोखला है – बिना संगति हम एक दूसरे से प्रेम करना नहीं सीख सकते हैं – “और उससे हमें यह आज्ञा मिली है, कि जो कोई अपने परमेश्वर से प्रेम रखता है, वह अपने भाई से भी प्रेम रखे” – 1युहन्ना 4:21

“मेरी आज्ञा यह है, कि जैसा मैंने तुम से प्रेम रखा, वैसा ही तुम भी एक दूसरे से प्रेम रखो- युहन्ना 15:12

प्रभु आपको आशीष दे। आमीन