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Bible Story – The last supper

Jesus’ last supper with his disciples was an important event in his ministry. He set an example of being a ‘servant leader’ and was betrayed by his one of the disciples – Judas. How things unfolded in the supper – watch the video.

Hindi text of the story is made available on the page below.

आखिरी भोज

वो एक त्योंहार का दिन था और सभी इस्रायली लोग परमेश्वर के छुटकारे दिन को याद करने के लिये इकट्ठा हुए थे। परमेश्वर ने उनको मिश्र देश की गुलामी से छुड़ाया था। “अब हम कहाँ पर अपना त्योंहार-भोज करेंगे और वो कब होगा,” उन बारह चेलों ने प्रभु यीशु से पूछा। यीशु ने उनको उस स्थान का पता बताया जहाँ वो सब मिलकर विशेष भोज करने वाले थे।

खाना खाने बैठने से पहले, प्रभु यीशु पानी का एक बड़ा तसला (कटोरा) और एक तौलिया ले आये। चेले यह देखकर चकित हुए क्योंकि यह काम तो किसी दास को करना चाहिये था, आखिर वो सब बहुत दूर से चलकर आये थे और थके हुए थे। प्रभु यीशु उनके अगुवा थे परंतु वो स्वयं झुके और उनके धूल-भरे पैर धोने व पोंछने लगे। चेले यह देखकर और भी चकित हुए क्योंकि अगुवा या गुरू कभी ऐसा नहीं करते।

पतरस को लगा कि यह ठीक नही है। उसने बोला, “प्रभु, यह तो ठीक नहीं है। हमें तो आपके पैर धोने चाहिये पर आप हमारे पैर धो रहे हैं।” परंतु यीशु ने बोला, “यदि मैं ऐसे निकृष्ट काम करने में घृणा महसूस नहीं करता और बुरा नहीं मानता, तो आप लोगों को भी ऐसा ही स्वभाव दिखाना चाहिये। आप सभी आपस में ऐसा ही व्यवहार करना और एक दूसरे की देखभाल करना – जैसा मैंने आप लोगों से किया है। इसका मतलब यह भी हो सकता है कि आपको वो काम करने पड़ें जो कोई और नहीं करना चाहता।” प्रभु यीशु ने एक ऐसा गुरू अथवा अगुवा होने का स्वभाव दिखाया था जो दास बनने के लिये तैयार था।

अब खाने का समय था और सब चेले प्रभु यीशु के साथ मिलकर खाना खाने लगे। प्रभु यीशु ने रोटी उठाई, परमेश्वर का धन्यवाद किया और टुकड़े करके सबको खाने को दी। “यह मेरी देह (शरीर) है जो मैं तुम्हारे लिये देता हूँ।” प्रभु यीशु ने कहा और फिर एक प्याला लिया जिसमें अंगूर का रस था। उन्होंने परमेश्वर का धन्यवाद किया और फिर बोला, “यह मेरा लहू है मतलब मेरा जीवन जो मैं तुम सब के लिये देता हूँ। मैं अपनी मृत्यु के द्वारा बहुत सो लोगों को परमेश्वर के पास वापस लाऊँगा।”

अधेरा हो चला था। यहूदा बीच में ही उठकर चला गया ताकि दुश्मनों को खबर दे कि यीशु कहाँ थे।

“आज की रात बीतने से पहले तुम सब मुझे छोड़कर चले जाओगे।” यीशु ने कहा।

“पर मैं तो नहीं। मैं तो कभी आपको नहीं छोड़ूँगा।” पतरस बोल उठा परंतु यीशु ने उसकी बात को काटते हुए कहा, “हाँ तुम भी, आज की रात बीतने से पहले तुम मुझे पहचानने से भी इंकार कर दोगे।” पतरस और सभी साथी यह सुनकर बहुत दुखी हुए क्योंकि उन्हें यह बात अच्छी नहीं लगी और वो यह भी नहीं चाहते थे कि यीशु कहीं चले जायें या मारे जायें।

यीशु ने उनको ढाढस बंधाते हुए कहा, “मैं अपने घर जाऊँगा, अपने पिता के घर। लेकिन परेशान मत हो, मैं फिर वापस भी आऊँगा और फिर एक दिन तुमको भी ले जाऊँगा ताकि तुम भी मेरे पिता के घर में मेरे साथ रह सको। अभी तुमको बस इतना करना है कि मुझ पर विश्वास करो। मैं तुमसे हमेशा प्रेम रखूँगा।” और फिर उनको आज्ञा दी, “यदि तुम मुझ से प्रेम करते हो तो जैसे मैंने तुमको सिखाया है, ऐसे ही एक दूसरे से प्रेम रखना। मैं जा तो रहा हूँ लेकिन तुम्हारे लिये एक विशेष सहायक भेजूँगा ताकि वो तुम्हारे साथ रहे।”

फिर वो टहलने के लिये एक अंजीर के बगीचे में चले गये। वो एक सुनसान रात थी और यीशु वहाँ शांति से बैठकर अपने पिता से बातें करने लगे, “पिता, आप सब कुछ कर सकते हैं। आप चाहें तो मुझे इस घृणित मृत्यु से भी बचा सकते हैं। फिर भी यदि यही आपकी इच्छा है तो मेरी नहीं पर आपकी इच्छा पूरी हो।”

यीशु प्रार्थना कर ही रहे थे कि एकाएक बहुत से लोग रोशनी और तलवारें आदि लेकर वहाँ आ पहुँचे। उस भीड़ में बहुत से सैनिक थे और इस भीड़ के आगे यहूदा चल रहा था।

“यीशु!” यह कहकर यहूदा ने यीशु को गाल पर चूम लिया। यह उन सैनिकों के लिये एक चिन्ह था कि यही यीशु मसीह है। उन सैनिकों ने तुरंत यीशु को पकड़ लिया और बंदी बना लिया। यीशु के मित्रों ने उनकी मदद करने की कोशिश की परंतु यीशु ने उनको मना कर दिया। वो किसी प्रकार की मारपीट और खूनखराबा नहीं चाहते थे। चेले और मित्र यह देखकर वहाँ से भाग गये।

शिक्षा – परमेश्वर हमसे प्रेम करते हैं और हमारे पापों की कीमत चुकाने के लिये अपने पुत्र यीशु को मरने के लिये भेजा। हमें प्रभु यीशु पर विश्वास करना चाहिये और उनका तिरस्कार नहीं करना चाहिये।