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क्या आप पहलवान, मुक्केबाज या सैनिक हैं

मुख्यतया जब हम लड़ाई शब्द सुनते हैं तो हमारे मन में सर्वप्रथम जो तस्वीर बनती है, वह ऐसी होती है जिसमें हमें ऊँची आवाज में बात करते लोग, शारीरिक रूप से धक्का-मुक्की तथा गाली-गलौच के बारे में सोचने लगते हैं। बाइबल में 'फाइट' शब्द को कुश्ती लिखा है जो कि फिर भी हमें थोड़ा परिष्कृत लगता है परंतु क्या सच में सभी तरह की लड़ाई अथवा कुश्ती गलत होती हैं?

एक पहलवान कुश्ती लड़ता है, परंतु चोर भी पकड़े जाने पर उतना ही ज़ोर लगाकर अपने आप को छुड़ाने की कोशिश करता है। एक मुक्केबाज घूँसे चलाता है, परंतु सड़क पर लड़ने वाला आवारा व्यक्ति भी ऐसा ही करता है। एक सैनिक गोली चलाता है और वक्त पड़ने पर अपने प्रतिद्वंदी को मार भी डालता है, और एक डाकूओ का सरदार भी ऐसा ही करता है। तो फिर उनके लड़ने में क्या अंतर है?

हमारा दृष्टिकोण, व्यवहार, लक्ष्य तथा तौर-तरीके हमारी लड़ाई को अच्छी या बुरी बनाते हैं।

एक डाकू अथवा गुंडों के गिरोह के सरदार का लक्ष्य अपने आपको बचाना तथा अपने बुरे कामों पर पर्दा डालना होता है जिसके लिये वह किसी भी हद तक जाकर लड़ता है। यहाँ तक कि वो खून बहाने तथा मरने-मारने के लिये भी तैयार होता है। देश की सीमा पर लड़ने वाला सैनिक भी गोली चलाता है और अपने सामने खड़े प्रतिद्वंदी को मार भी सकता है, परंतु हमें उसका लड़ना गलत नहीं लगता क्योंकि उसका लक्ष्य अपने देश की सुरक्षा तथा सम्मान की रक्षा करना है।

उसी प्रकार एक मुक्केबाज खेल भावना के साथ जब अपने प्रतिद्वंदी से लड़ता है तो उसका लक्ष्य उसका नुकसान करना या चोट पहुँचाना नहीं होता। एक अच्छा मुक्केबाज खिलाड़ी किसी गलत तरीके का इस्तेमाल जीतने के लिये नहीं करता। जैसे कि वो बेल्ट के नीचे वार नहीं करता और न ही ऐसे किसी दूसरे तरीके का उपयोग अपने सामने वाले खिलाड़ी को हराने के लिये करता है। परंतु एक सड़कछाप गुंडा अपने बुरे इरादे को पूरा करने के लिये इस प्रकार लड़ता है कि वो न सिर्फ लात-घूँसे चलाता है बल्कि किसी हथियार का उपयोग करने से भी नहीं चूकता। वह किसी प्रकार के नियमों का पालन नहीं करता और उसका लक्ष्य सामने वाले का नुकसान करना ही होता है। तो इस प्रकार हम सीखते हैं कि न सिर्फ लक्ष्य तथा व्यवहार बल्कि तरीका भी हमें बताता है कि लड़ने वाले की लड़ाई अच्छी है या बुरी।

एक पहलवान भी अपने नियमों के दायरों में रहकर ही कुश्ती लड़ता है तथा उसकी इच्छा किसी भी प्रकार से अपने प्रतिद्वंदी को मार डालने या नुकसान पहुँचाने की नहीं होती है। वह अपनी जीत के द्वारा अपनी टीम तथा देश को गौरवान्वित करता है। इसके विपरीत एक चोर अपने पकड़े जाने पर अपने पकड़ने वाले से पूरा ताकत लगाकर कुश्ती करता है कि किसी प्रकार अपने को छुड़ा ले और भाग जाये। उसका न तो उद्देश्य, न व्यवहार और न तौर-तरीका किसी भी प्रकार से किसी को गौरवान्वित करता है। जहाँ कुश्ती का पहलवान अपने प्रतिद्वंदी को मित्र की तरह देखकर लड़ता है, चोर अपने पकड़ने वाले को अपना दुश्मन समझता है। हर प्रकार से इस चोर की लड़ाई को गलत ही ठहराया जा सकता है (अच्छा नहीं)।

प्रभु यीशु मसीह के चेले होने के नाते हमें भी एक लड़ाई लड़ने के लिये कहा गया है - विश्वास की अच्छी लड़ाई / कुश्ती।  

विश्वास की अच्छी कुश्ती लड़; और उस अनंत जीवन को धर ले, जिसके लिये तू बुलाया गया और बहुत से गवाहों के सामने अच्छा अंगीकार किया था।  

[1 तीमुथियुस 6:12]

हमारे सामने दो प्रतिद्वंदी हैं। एक तो प्रत्यक्ष रूप से हम पर निरंतर वार करता है परंतु दूसरा छुपा हुआ है और जब तक हम सावधान न रहें, हम हर पल हारने की कगार पर सरकते रहते हैं। पहला प्रतिद्वंदी, जो कि किसी भी प्रकार से हमारा मित्र नहीं है - उसका नाम शैतान है। उसकी योजनायें, व्यवहार तथा तौरतरीके हमारा नुकनान करने, हमसे चुराने, घात करने और नाश करने की रहती हैं (यूहन्ना 10:10)। वह गरजने वाले सिंह के समान फिरता है और अपने जलते हुए तीर हम पर चलाता रहता है (इफिसियों 6:16)

वो हम पर हमेशा गलत तरीकों से, अवैधानिक तरीकों से हमला करता है। उसकी लड़ाई अथवा कुश्ती में गलत दाँव-पेंच हैं परंतु हमें अच्छी कुश्ती ही लड़नी है।

हमारा दूसरा शत्रु हमारा अपना शरीर है। यह हमें प्रत्यक्ष तौर पर दुश्मन नहीं नज़र आता और न ही हम इसकी चालों की ओर ध्यान देते हैं परंतु यह निरंतर हमें गिराने, अपवित्र चाल चलने, तथा नाश करने की फिराक में रहता है। शैतान हमारे इस दूसरे शत्रु की पूरी पूरी मदद करता है और संसार कि अनेक अभिलाषाओं में इसे डालता है ताकि यह हमसे पाप करवा ले और हमें किसी प्रकार गिरा दे। हमें इससे भी एक मुक्केबाज की तरह (हवा में घूँसे चलाते हुए नहीं) लड़ना है जैसा पौलुस ने सिखाया है (1 कुरिन्थियों 9: 27)

...मैं अपनी देह को मारता कूटता और वश में लाता हूँ, ऐसा न हो कि औरों को प्रचार करके मैं आप ही किसी रीति से निकम्मा ठहरूँ।

हमें अच्छा चेला बनने के लिये एक अच्छा लड़ाका बनना भी ज़रूरी है जो शैतान तथा शरीर से अच्छी कुश्ती लड़ सकें। यदि हमने प्रभु यीशु पर विश्वास किया है तो ज़रूर ही हमने इसकी कीमत का अंदाजा लगाया है, यीशु के पीछे चलने के लिये अपने आप का इंकार करने तथा क्रूस को उठाकर (चाहे कष्ठ भी आयें तो उन्हें सहते हुए प्रभु की इच्छा पर) चलने के लिये अपनी कमर कस रखी है। यदि ऐसा है तो बस सावधान होकर इस लड़ाई में भी शामिल हो जायें ताकि जब इस दुनिया के दिन पूरे कर हम जाने लगें तो हम भी पौलुस कि तरह हम कह सकेः

मैं अच्छी कुश्ती लड़ चुका हूँ, मैं ने अपनी दौड़ पूरी कर ली है, मैं ने विश्वास की रखवाली की है।

[2 तीमुथियुस 4:7]

अन्त में मैं आपको 2 बातें और बताकर उत्साहित करना चाहता हूँ। एक पहलवान, मुक्केबाज तथा सैनिक की लड़ाई अपनी जगह ठीक हो सकती हैं, परंतु हमारी लड़ाई उनकी तुलना में फिर भी भिन्न है। वे जीत के लिये लड़ते हैं परंतु हम पहले से ही जीते हुए हैं। इसके अलावा हमें पवित्र आत्मा दिया गया है जो हमें सहायता करता है तथा लगातार लड़ने के लिये सामर्थ देता है। तो आप पहले से जीते हुए हैं सो निरंतर इस जीत में चलते रहें।

और उसने प्रधानताओं और अधिकारों को ऊपर से उतारकर उनका खुल्लमखुल्ला तमाशा बनाया और क्रूस के द्वारा उन पर जय-जयकार की ध्वनि सुनाई।

[कुलुस्सियों 2:15]


प्रभु यीशु जो जल्द ही आने वाले हैं, आपको आशीष दें तथा आपकी इस दैनिक लड़ाई में विजेता बने रहने में सहायता करें। आमीन।


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