आदरणीय पाप - भय, चिंता, झुंझलाना तथा धन्यवादित न होना

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परमेश्वर का वचन बताता है कि यदि कोई ऐसी चीज़ है जो हमारी प्रार्थनाओं को ईश्वर तक पहुँचने से रोक सकती है तो वो हमारे पाप ही हैं (यशायाह 59 : 1, 2) और जब तक हम अपने पापों को अंगीकार करके उनकी माफी न मांग लें (1 यूहन्ना 1:9) हमारे पाप क्षमा नहीं हो सकते - इसलिये हमें अपने उन छुपे हुए पापों को जानना और उनकी माफी मांगना नितांत आवश्यक है।

बाइबल के एक वचन की ओर मैं आपका ध्यान आकर्षित करना चाहता हूँ -

यीशु मसीह कल और आज और युगानयुग एक सा है  - [इब्रानियों 13:8]

यदि बाइबल पर आप विश्वास करते हैं तो इसे ज़रूर आप एक वायदे के रूप में मानते होंगे और यदि आप बाइबल में विश्वास नहीं भी करते तौभी आप यह तो समझते होंगे कि ईश्वर कभी नहीं बदलता। यदि ऐसा है तो हम जान सकते हैं कि उसने अब्राहम को आशीष दी तो वो आज भी हमें आशीष देगा, दानिय्येल को शेर से बचाया तो हमें भी कठिन से कठिन परिस्थिति में भी बचायेगा, मूसा के द्वारा बड़े बड़े आश्चर्यकर्म किये तो हमारे द्वारा भी करेगा, इस्रायलियों को 40 वर्ष तक स्वर्ग से भूख, प्यास और सुरक्षा दी तो हमें भी देगा। यह सब बात सत्य हैं।

परंतु यह वचन हम एक चेतावनी के रूप में भी देख सकते हैं - यदि ईश्वर कभी नहीं बदलता तो वह पाप से कल भी घृणा करता था तो आज भी करता है। पहले वह पाप की सज़ा देता था तो आज भी देगा। हम पर हमारे पापों का दंड इसलिये नहीं आया क्योंकि यीशु मसीह ने हमारे पापों की सज़ा अपने ऊपर ले ली और हमें पापों से मुक्त किया और अनुग्रह (कृपा) का यह समय दिया है जिसमें परमेश्वर न्याय करने से पहले मन फिराने का मौका दे रहा है। तो ईश्वर की कृपा के समय में हम अपने पापों से मन क्यों न फिरा लें।

यहाँ हम प्रकट पापों (चोरी, हत्या, डाका, बलात्कार आदि) के बारे में बात नहीं कर रहे हैं जिनके बारे में हमारा विवेक भी हमें बताता रहता है, अपितु यहाँ हम ऐसे पापों के बारे में बात कर रहे हैं जो छुपे हुए हैं, या होते तो हैं पर हम उनके बारे में कभी सोचते नहीं हैं।

हम दिन में कितनी बार पलक झपकते हैं, क्या हमें मालूम चलता है? ज्यादातर दायें हाथ से काम करने वाले लोग अपनी पेंट पहनते वक्त बाँयां पैर पहले उठाते हैं, क्या आपने कभी इस बारे में सोचा है? ऐसे ही कुछ पाप हमारे जीवन में रोज होते हैं पर हमें मालूम भी नहीं चलता। उनमें से कुछ हैं:

  • भय
  • चिंता
  • झुंझलाना, तथा
  • धन्यवादित न होना

कितनी ही बार हम इन बातों को अपनी ज़िन्दगी में स्थान देते हैं और यहाँ तक कि उनको आम बात मानकर भूल जाते हैं। कितनी ही परिस्थितियों में हम डर जाते हैं, नहीं भी तो चिंता तो करते ही हैं। कभी जब कुछ बात हमारी योजना के अनुसार पूरी नहीं होती तो हम झुंझलाते हैं - जैसे कि हमने कहा हो - तेरी नहीं हमारी मर्ज़ी पूरी हो। कितनी ही बातें रोज हमारे जीवन में होती हैं परंतु हम परमेश्वर का धन्यवाद नहीं करते, यहाँ तक कि कुड़कुड़ाते हैं।

क्या हम इन बातों को पाप की तरह देखते हैं। शायद नहीं। परंतु यह सब पाप हैं। क्योंकि मेरे विचार में ईश्वर पर भरोसा न करके उसकी आज्ञा का उल्लंघन करना ही पाप है। तो जब परमेश्वर अपने वचन में कहता है कि -

प्रभु में सदा आनंदित रहो, मैं फिर से कहता हूँ, आनंदित रहो... किसी भी बात कि चिंता मत करोच परंतु हर एक बात में तुम्हारे निवेदन, प्रार्थना और विनती के द्वारा धन्यवाद के साथ परमेश्वर के सम्मुख उपस्थित किये जायें - [फिलिप्पियों 4:4,6]

या,

सदा आनंदित रहो, निरंतर प्रार्थना में लगे रहो, हर एक बात में धन्यवाद करो; क्योंकि तुम्हारे लिये मसीह यीशु में परमेश्वर की यही इच्छा है।  - [1 थिस्स. 5:16-18]

या,

क्योंकि परमेश्वर ने हमें भय की आत्मा नहीं दी है...।  - [2 तिमुथियुस 1:7]

तो परमेश्वर इन वचनों में झूठ बोल रहा है? क्या उसका तात्पर्य यह नहीं हैं कि हम चिंता, डर तथा झुंझलाने से उसके विरुद्ध पाप करते हैं क्योंकि हम उसकी आज्ञा का उल्लंघन करते हैं। क्या जगत के सृष्टिकर्ता ईश्वर पर अपने जीवन की छोटी छोटी परिस्थितियों में भी भरोसा नहीं कर सकते।

जी हाँ, परमेश्वर पर पूरा भरोसा ना करने से ही हमसे यह सारे पाप होते हैं जो हमसे छिपे रहते हैं। क्या हम आज अपने इन पापों से मन फिरायेंगे। क्या हम कहेंगे कि प्रभु हमारी अच्छी, बुरी, आसान, कठिन तथा सुख की और दुख की हरेक घड़ी में हम आप पर विश्वास करेंगे, चिंता व भय नहीं करेंगे बल्कि धन्यवाद करेंगे क्योंकि आप नियंत्रण में हैं और हरेक परिस्थिति में आप हमारे लिये भलाई को उत्पन्न करेंगे।

आइये, एक प्रार्थना के रूप में अपने पापों को परमेश्वर के सामने मानकर आज से हम उसका अनुसरण कर एक धन्य जीवन बिताने की आशीष प्राप्त करें:

हे पिता परमेश्वर, मैं धन्यवाद करता हूँ कि मेरी आत्मिक आँखें खोलकर आपने मुझे मेरे इन छिपे हुए पापों से मुझे अवगत कराया है। आज मैं इन सभी पापों की भी माफी आपसे मांगता हूँ जब जब मैने चिंता की, डर माना परंतु आप पर भरोसा नहीं किया। कितनी ही बातों के लिये मैंने आपको धन्यवाद नहीं किया। प्रभु, अपनी असीम दया के कारण मेरे पाप क्षमा कर दीजिये और अपने पवित्र आत्मा से मुझे भर दीजिये ताकि अपने संपूर्ण जीवन से मैं आपकी महिमा कर सकूँ। प्रभु यीशु के नाम से मांगता हूं, आमीन।
 

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 "Come unto me, all ye that labour and are heavy laden, and I will give you rest. "

[Matthew 11:28]