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अपने ईश्वर से मन, प्राण तथा बुद्धी से प्रेम कर

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उसने उससे कहा, तू परमेश्वर अपने प्रभु से अपने सारे मन, और अपने सारे प्राण और अपनी सारी बुद्धि के साथ प्रेम रख।

[मत्ती 22:37]

इस वचन का क्या अभिप्राय है? ईश्वर से मन, प्राण तथा बुद्धी से प्रेम करना क्या होता है?

संक्षेप में कहें, तो दिल हमारी भावनाओं का प्रतीक है, प्राण हमारी इच्छा तथा मन का, तथा बुद्धी परिस्थिति तथा समझ के आधार पर हमारी निर्णय लेने की क्षमता का।

तो क्या ? ईश्वर से प्रेम करने में इन बातों का क्या योगदान है?

परमेश्वर चाहता है कि हम अपने संपूर्ण व्यक्तित्व के साथ उस परमेश्वर की भक्ति आराधना करें। जैसे हम उसके पास जाते हैं तो हमारा, मन, प्राण तथा बुद्धि ईश्वर की ओर ही एकाग्रचित्त हो, जैसे दाउद अपने एक भजन में लिखता है कि हे मेरे मन, परमेश्वर को धन्य कह, और जो कुछ भी मुझमें है, उसके पवित्र नाम को धन्य कह।

जो विश्वास हम प्रभु यीशु में रखते हैं, वह दुनिया के बहुत से आध्यात्मिक विश्वासों जैसा 'अंधविश्वास' नहीं है जहाँ हम इंसान के बनाये कितने ही रीतिरिवाजों, संस्कारों तथा विधियों में फंसकर बहुत कुछ करते तो हैं परंतु हमें मालूम नहीं होता कि हम वह करते क्यों हैं, और ये कब शुरू हुआ और इससे क्या लाभ होगा। ईश्वर हमसे यह मांग करता है कि हम उसे जानें। मसीही विश्वास में ईश्वर अपने वचन तथा व्यक्तिगत अनुभव से हमें यह मौका देता है कि हम उसे जान सकें - और यह सब हम अपनी बुद्धि से करते हैं।

बाइबल ईश्वर का वचन है। यही एकमात्र ऐसी धर्मपुस्तक है जिसकी छानबीन सदियों से कई विद्वानों के द्वारा की गई परंतु कोई भी इसमें एक भी खोट नहीं निकाल पाया। बहुत से लोगों ने इसे नष्ट कर देने का पूरा पूरा प्रयास किया परंतु परमेश्वर का यह सिद्ध वचन हरेक बात का सामना कर आज भी अपनी जगह अटल है। इसके विरोध में उठने वाली हरेक बात तो नीचे हो गई, परंतु इसको सही साबित करने वाले बहुत से तथ्य समय समय पर बाहर आते रहे हैं। यह वचन हमें अपनी बुद्धि से यह जान लेने का मौका देता है कि ईश्वर कौन है, और उसकी क्या मर्जी है और उसका हमारे लिये क्या उद्देश्य है। इसी कारण मेरी जैसी वैज्ञानिक बुद्धि वाला व्यक्ति भी परमेश्वर को जानकर उससे प्रेम करने के लिये अपने आप को नतमस्तक कर सकता है।

इसी प्रकार हमारी 'इच्छा' को भी परमेश्वर से प्रेम करने के लिये समर्पित होना आवश्यक है। जब तक हम स्वेच्छा से ईश्वर की महानता के सम्मुख अपने आपको ना झुका दें, हम उससे प्रेम संबंध कैसे स्थापित कर सकते हैं। जब तक एक युवती जो किसी युवक को मन से पसंद तो करती हो, बौधिक रूप से जानती भी हो कि वही उसके लिये सबसे उपयुक्त वर हो सकता है, तौभी जब तक वह अपनी इच्छा से अपने आपको उसकी पत्नि होने के लिये प्रेम में समर्पित ना कर दे, तब तक वो उसकी पत्नि नहीं कहला सकती। ठीक वैसे ही हम ज्ञान से तो जान लें कि ईश्वर कैसा है और कौन है, परंतु अपनी ईच्छा से उससे प्रेम न रखें तो हमारा संबंध कैसे हो सकता है, हमें उस पर विश्वास कैसे हो सकता है।.

तीसरा महत्वपूर्ण आयाम है - दिल - अर्थात हमारी भावना। यूँ तो भावनायें हमें धोखा ज्यादा देती है और ईश्वर में हमारे विश्वास को डिगाने का काम ही ज्यादा करती है। कैम्पस क्रूसेड फॉर क्राइस्ट द्वारा दिये गये एक महत्वपूर्ण कोर्स में हमने विश्वास की एक परिभाषा को सीखा है जिसको हिन्दी में यूँ कहा जा सकता है - विश्वास हमारा इस धारणा को सत्य मानकर जीवन जीने का चुनाव है कि बाइबल परम-ईश्वर का सत्य तथा जीवित वचन है (जो कि है भी), चाहे हमारी परिस्थितियाँ, भावनायें तथा संस्कार कुछ भी क्यों न कहते हों, परंतु हम अपनी जीवन वैसे ही जीयें जैसा कि ईश्वर का वचन बाइबल कहती है। इस आधार पर हम जान सकते हैं कि भावनायें हमारे विश्वासी जीवन का आधार नहीं बन सकती हैं।

उदाहरण के तौर पर एक ऐसे व्यक्ति की कल्पना कीजिये जिसको डॉक्टर ने स्पष्ठ तौर पर कह दिया है कि उसके कैन्सर की बीमारी है और उसके पास ज्यादा से ज्यादा 2 महिने का समय शेष है। उस व्यक्ति की भावनायें (दिल) डॉक्टर की रिपोर्ट पर विश्वास करता है और इसलिये वह अत्यंत डर तथा मौत की प्रतीक्षा करता हुआ जीवन बिताने लगता है जबकि परमेश्वर का वचन हमें लंबी आयु की आशीष देने की बात करता है।

या दूसरा उदाहरण देखिये - परमेश्वर का वचन कहता है कि हम प्रभु यीशु के बलिदान पर विश्वास तथा अपने पापों के अंगीकार के कारण अब पाप के लिये मृत हैं (गलतियों 2:20) और परमेश्वर की पवित्रता बन चुके हैं (2 कुरि. 5:21), परंतु हम में से कितने विश्वासी अपने आपको पवित्र तथा धर्मी और पाप के लिये मृत समझते हैं। नहीं समझते जबकि हैं। क्योंकि हमारी भावनायें हमारे दैनिक जीवन को देखकर हमें बताती रहती हैं कि तुम पापी हो, तुम अभी भी पाप करते हो, तुम कैसे पवित्र हो सकते हो। और हम ऐसा ही मानने लगते हैं।

फिर भी परमेश्वर तो कहता है कि दिल से भी प्रेम करना है। जी हाँ। हमारी सिर्फ यही भावना ज़रूरी है जो हमारे दिल से पैदा होती है - प्रेम। हमारी इच्छा तथा ज्ञान परमेश्वर से अपने आप से प्रेम नहीं कर सकते - उन्हें हमारे दिल की ज़रूरत पड़ती ही है।

मैं विश्वास करता हूँ कि आप जो यह लेख पढ़ रहे हैं, ईश्वर से प्रेम करते हैं, अन्यथा आप इस लेख का शीर्षक पढ़कर ही इसे छोड़ देते। परंतु क्या आप परमेश्वर से सच में वैसा प्यार कर पाते हैं जैसा कि वो हमसे अपेक्षा रखता है। मैं आपको उत्साहित करना चाहता हूँ कि आप पवित्र आत्मा की और भरपूरी मांगें ताकि ईश्वर से और ज्यादा प्रेम कर सकें और उसमें बढ़ सकें।

आइये प्रार्थना करें:

प्रिय पवित्र आत्मा परमेश्वर, मैं सच में अपने मन, प्राण तथा बुद्धि से प्रेम रखना चाहता हूँ। इसलिये मैं अपना सारा दिमाग, अपनी सारी इच्छायें तथा अपनी सारी भावनायें आपके अधीन लाता हूँ। कृपया मेरी सहायता कीजिये तथा मेरे विश्वास को बढ़ाइये। धन्यवाद, आमीन ।

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