7 कानूनी बातें जो परमेश्वर के सेवक के लिये जानना ज़रूरी है

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टी वी में समाचार देखने पर और अपने व्यक्तिगत अनुभव से मैंने यह पाया कि मसीही प्रचारकों पर जो दोष हिंदुत्ववादी संगठनों व धर्मनिरपेक्ष समाचार-पत्रों द्वारा लगाया जाता है वह है – जबरन धर्म परिवर्तन, या अंधविश्वास फैलाकर धर्म-परिवर्तन अथवा लालच देकर धर्म-परिवर्तन करना।

जो मसीही विश्वास का विरोध करते हैं, वे आत्मिक चमत्कारों को पाखंड, परमेश्वर के प्रेम व बाइबल में दी गई ईश्वर की प्रतिज्ञाओं को लालच व गरीब लाचारों को सुसमाचार सुनाकर विश्वास में लाने को जबरन धर्म-परिवर्तन का नाम देते हैं। संपूर्ण मसीहीयत को आज एक अलग आस्था के रूप में देखने के बजाय धोखाधड़ी करने का प्रयास बताया जा रहा है। एक ऐसा निर्मूल डर जिसका कोई आधार नहीं है उससे डराया जा रहा है कि शायद ५% मसीही लोग ७०% हिंदुस्तान को ईसाई देश बना डालेंगे।

जहाँ यह बात सच है कि 800 साल के मुस्लिम शासन में भारत इस्लामिक देश नहीं बना और अंग्रेजों के 200 साल के शासन में हिंदुस्तान एक ईसाई देश नहीं बना, वहीं एकाएक एक विमर्श फैला दिया गया है, सांप्रदायिक ज़हर देश के लोगों में फैला दिया गया है कि हिंदु धर्म खतरे में है। इस के फलस्वरूप एक अंधभक्त वर्ग क्रोध में अंधा हो गया है और दूसरा वर्ग जो पढ़े-लिखे हिंदुओं का है उसमें भी एक भयमिश्रित गुस्सा भर गया है। अतिवादी जहाँ मसीही संस्थाओं को तहस-नहस करते हैं, पढ़ा-लिखा वर्ग उसे मौन स्वीकृती देता है – कि जो हुआ अच्छा हुआ, ऐसों के साथ ऐसा ही होना चाहिये। कुछ आवाजें उठती हैं तो इस अतिवाद, धार्मिक-आतंकवाद को गलत बताती हैं परंतु उनकी संख्या इतनी कम है कि उनका होना और न होना ज्यादा अंतर पैदा नहीं करता।

परंतु फिर भी क्या यह सत्य है कि बाइबल धर्म-परिवर्तन करने की शिक्षा देती है?

नहीं!

यह एक कोरी कल्पना है। मूर्खता की बात यह भी है कि ऐसे कट्टरपंथी सोचते हैं कि जहाँ हिंदू धर्म सनातन है, मसीही धर्म या मसीही शिक्षा सिर्फ २००० साल पुरानी है। प्रभु यीशु के जन्म से 4000 साल पहले, सृष्टि की शुरुआत से शुरू हुई परमेश्वर की योजना बाइबल की पूर्ण सच्चाई है, और इस नज़र से मसीही विश्वास पुरातन या सनातन विश्वास है, जो वैज्ञानिक तथ्यों के साथ चलता है। विज्ञान के अनुसार मनुष्य की सारा इतिहास 6000 साल से ज़्यादा का नहीं है। बाइबल की 66 किताबों में से किसी में भी जगह ‘धर्म-परिवर्तन’ शब्द या इससे जुड़ी बात का ज़िक्र नहीं है। प्रभु यीशु के चेलों में से किसी ने भी धर्म-परिवर्तन की अगुवाई नहीं की।

मैं स्वयं धर्मपरिवर्तन के खिलाफ हूँ। मेरे विचार में ज्यादातर या शायद सभी मसीही सेवक भी धर्म-परिवर्तन की पैरवी नहीं करेंगे।मैं हिंदू परिवार में जन्मा हूँ और अपनी विधिसम्मत पहचान में कोई परिवर्तन करने का इच्छुक नहीं हूँ। प्रभु यीशु में मेरा विश्वास मेरा संवैधानिक अधिकार है और जीवन-पर्यंत मैं अपने विश्वास और प्रभु यीशु की आज्ञाओं में, जो कि बाइबल में वर्णित हैं, उनका पालन करता रहूँगा ताकि अनंत जीवन को प्राप्त करूँ।

परंतु अब सवाल है कि यदि सभी मसीही संस्थायें और मसीही प्रचारक धर्म-परिवर्तन के इच्छुक नहीं हैं तो फिर मीडिया और कट्टरपंथी इसे धर्म-परिवर्तन का नाम क्यों देते हैं। प्रभु की सेवा करते समय कौन सी कानूनी बातों को ध्यान में रखने की आवश्यकता है। आइये, कुछ संवैधानिक बातों पर ध्यान करें ताकि अनचाहे सताव से बचे रहें या फिर सताव आये तो उसका सामना बुद्धिमानी के साथ कर सकें।

भारत के संविधान की प्रस्तावना इस प्रकार हैः

हम भारत के लोग, भारत को एक सम्पूर्ण प्रभुत्व सम्पन्न, समाजवादी , धर्मनिरपेक्ष,लोकतंत्रात्मक गणराज्य बनाने के लिए तथा उसके समस्त नागरिकों को :सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय, विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता, प्रतिष्ठा और अवसर की समता प्राप्त करने के लिए तथा उन सबमें व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता और अखण्डता सुनिश्चित करनेवाली बंधुता बढ़ाने के लिएदृढ संकल्प होकर अपनी इस संविधान सभा में आज तारीख 26 नवम्बर 1949 ई0 (मिति मार्ग शीर्ष शुक्ल सप्तमी, सम्वत् दो हजार छह विक्रमी) को एतदद्वाराइस संविधान को अंगीकृत, अधिनियमित और आत्मार्पित करते हैं।

हम इस बात को याद रख सकते हैं कि संविधान की प्रस्तावना हमें हमारे देश का निर्माण करने वालों के मन में झाँकने देती है। हमारा देश एक धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक राष्ट्र है। हमारे देश में न किसी धर्म विशेष को ऊँचा किया जा सकता है और न किसी धर्म विशेष को नीचा। हमारे देश का कोई एक धर्म नहीं है। कानून का दर्जा सबसे ऊँचा है और कोई भी हमारे देश में संविधान से ऊपर नहीं है। न्याय, स्वतंत्रता, समता तथा भाईचारा हमारे देश की मूलभावना का प्रतीक है।

यदि देश के संविधान की मूलभावना के अनुरूप आप परमेश्वर की सेवा कर रहे हैं तो आप देश की सेवा कर रहे हैं। इसलिये आप अपने आप को देशभक्त कह सकते हैं – और आप हैं भी। इस बात से आपको हियाव मिलना चाहिये कि आप को सभी विधिसम्मत कार्य करने की आज़ादी है, कानून के समक्ष सब बराबर हैं इसलिये आप के साथ भेदभाव नहीं हो सकता, न्याय की हमेशा जीत होगी और आप बाइबल की शिक्षा के अनुसार आप भाईचारे, प्रेम, एकता व समता की भावना के साथ हरेक जाति, धर्म तथा श्रेणी के लोगों के साथ सेवाकार्य कर सकते हैं।

भारतीय संविधान के भाग III में 12 से 35 अनुच्छेद में भारत के नागरिकों के मौलिक अधिकारों का वर्णन किया गया है। हो सकता है इन अधिकारों का आप इस्तेमाल सताव के समय न कर सकें परंतु इनके विषय में जान लेने से आपको अपने अधिकारों के लिये खड़ा होने में सहायता मिलेगी। ध्यान देंः

  • अनुच्छेद 14 और 15 में समानता के अधिकार का वर्णन है, जिसके अनुसार कोई भी आपके धर्म, जाति, लिंग, जन्मस्थान के कारण आपके साथ भेदभाव नहीं कर सकता।
  • अनुच्छेद 19 में स्वतंत्रता के अधिकार का ज़िक्र है जिसमें प्रेस की स्वतंत्रता, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, संघ या समिति बनाने का अधिकार, शांतिपूर्वक सम्मेलन/संगति करने का अधिकार आदि इस मौलिक अधिकार में निहित है।
  • अनुच्छेद 20 कहता है कि जब तक आप किसी कानून का उल्लंघन न करें, आपको गिरफ्तार नहीं कर सकता। यही कारण है कि भीड़ कोई न कोई झूठा-सच्चा आरोप लगाते हैं ताकि आपको गिरफ्तार किया जा सके। धर्म-परिवर्तन का आरोप लगाना आसान है इसलिये इसका उपयोग अधिकाई से किया जाता है।
  • अनुच्छेद 21 बड़ी स्पष्टता से आपकी दैहिक और प्राण की स्वतंत्रता का अधिकार आपको देता है।
  • अनुच्छेद 22 में बताया गया है कि यदि आपको किसी अपराध के लिये गिरफ्तार किया जाये तो आपको अधिकार है कि आप इसकी सूचना अपने प्रियजन को दे सकें व अपने लिये किसी वकील का इंतज़ाम कर सकें। पुलिस को 24 घंटे में आपको मजिस्ट्रेट  के सामने उपस्थित करना आवश्यक है और ऐसा न करने पर पुलिस को जवाब देना पड़ेगा।
  • प्रभु की सेवा करने वाले सेवकों को अनुच्छेद 25 के बारे में जानना लाभकारी है, जिसमें धार्मिक स्वतंत्रता का मौलिक अधिकार लिखा है। इसके अनुसार अपने धर्म को अबाध रूप से मानने, आचरण और प्रचार-प्रसार करने का अधिकार दिया गया है। अनुच्छेद 26 के साथ इसको पढ़ने पर अपने धार्मिक प्रयोजन के लिये संस्था बनाने व उसके पोषण का अधिकार, विधि अनुसार उसका प्रशासन करने व प्रबंध करने का अधिकार भी हमें प्राप्त है।

धार्मिक स्वतंत्रता का बिल राजस्थान असेंबली द्वारा 2008 में पास किया गया  जिसका उद्देश्य जबरन धर्म-परिवर्तन को रोकना था। केंद्रीय सरकार द्वारा 2017 में इसे वापस विचार करने के लिये भेज दिया गया। राजस्थान में यह कानून नहीं है परंतु कुछ एक राज्यों में धर्म परिवर्तन रोकने वाले कानून पारित किये गये हैं। जब तलक आप जबरन, लालच से या  धोखाधड़ी करके किसी का धर्म बदलने का प्रयास नहीं करते, यह कानून आपको कोई नुकसान नहीं पहुँचाते। हालांकि इन्हीं कानूनों का दुरुपयोग भीड़ और कट्टरपंथी संस्थायें मसीही सेवकों को परेशान करने के लिये करते हैं। फिर भी जब आप ऐसा कोई काम करते ही नहीं तो आधार व कोई सबूत नहीं मिल सकता और अंततः आपको दोषी साबित नहीं किया जा सकता है।

ऊपर दिये संवैधानिक अधिकारों के अतिरिक्त कुछ और व्यवहारिक बातें 7 बातें हैं जिनको एक मसीही सेवक को सीख लेना चाहिये ताकि अनावश्यक तनाव से बचा जा सके।

  1. आपका अधिकार अपनी नाक तक ही है और सामने वाले की नाक से उसका अधिकार क्षैत्र शुरू हो जाता है। यह तुलना बीते दिनों में दिल्ली में सरकारी वकील के रूप में काम कर चुके एडवॉकेट विवेक ने एक वर्कशॉप में बताया कि आपका अधिकार सिर्फ आप तक सीमित है। जैसे ही अपने किसी हाव-भाव, शब्दों अथवा कार्यकलाप के द्वारा किसी और के अधिकार का हनन करते हैं तो आप कानूनी रुप से दोषी हो जाते हैं। इसलिये इस बात का ध्यान रखें कि अपने प्रचार के दौरान आप किसी भी धर्म, आस्था, मूर्ति आदि के बारे में गलत शब्दों का इस्तेमाल न करें।प्रभु यीशु के समय में भी मूर्तिपूजक होते थे परंतु यीशु मसीह ने कभी किसी धर्म या आस्था की बुराई नहीं की। प्रभु ने सिर्फ अपने स्वर्गीय पिता की महिमा की, पाप-पश्चाताप-क्षमा-आज्ञाकारिता-पवित्रता व स्वर्ग-राज्य का प्रचार किया। प्रभु यीशु ने धर्म-परिवर्तन की कभी कोई बात नहीं की बल्कि मनुष्य जाति से प्रेम किया। प्रभु यीशु व प्रेरित जीवन जीने व प्रचार कार्य में हमारा उदाहरण हैं।
  2. अपने अधिकारों को जानें व सजग रहें। अपने भवन के प्रवेश द्वार आदि पर CCTV द्वारा आप निगरानी रख सकते हैं। गाँव में कार्य करने वाले छोटी संगतियों में मोबाइल द्वारा ऑडियो व विडियो रिकॉर्डिंग की जा सकती है ताकि यदि आपको परेशान करने के लिये भीड़ आदि आये तो आप कुछ सबूत अपने पास रखें जो कि गवाहों की गवाही के साथ इस्तेमाल किये जा सकें। प्रभु यीशु ने हमें अपनी सुरक्षा करने से कहीं भी मना नहीं किया है। कभी कभी सजग न रह कर हम अपने ऊपर दुखों का पहाड़ और सताव को ले लेते हैं, इसमें कोई समझदारी नहीं है। परमेश्वर ने हमें सर्प के समान चतुर व कबूतर की तरह भोले बनने के लिये कहा है।
  3. अपने पड़ोसियों के साथ अच्छे संबंध रखें। प्रभु यीशु ने बाइबल में हमें सिखाया है कि परमेश्वर से व अपने पड़ोसी से प्रेम करना है। यीशु मसीह ने हमें अपने दुश्मनों से भी प्रेम करना सिखाया है। हिंदुस्तान एक लोकतांत्रिक राष्ट्र है और इसलिये जब कई लोग आपके पक्ष या विपक्ष में कोई गवाही देते हैं तो सरकार व कानून उसका संज्ञान लेते हैं। यदि हमारे पड़ोसी हमारे बारे में अच्छा बोलें तो कठिन समय में यह हमारे पक्ष में काम करता है।
  4. अपने सभी कागजात ठीक रखें। ज्यादातर समस्या छोटी बात से शुरू होती है परंतु जब यह कानून की जटिल प्रकिया में जाती है तो जीवन के अनेक क्षैत्र को प्रभावित करती है। एडवॉकेट विवेक ने बताया कि ताज हॉटल व रेल्वे स्टेशन पर गोलियाँ चलाने वाले आतंकवादी पर जहाँ संगीन अपराधों के आरोप भी लगे, कानून ने इस बात का आरोप भी उस पर लगाया कि वह बिना प्लेटफॉर्म टिकट रेल्वे स्टेशन पर था। ठीक इसी तरह, एक बात से शुरू होने के बाद जब कानून आपकी संस्था के छोटे छोटे कागजातों को देखना शुरू करता है और त्रुटियाँ पाये जाने पर आपकी जिन्दगी को उलझा देता है। इसलिये अच्छा है कि आप समय पर कर चुकायें, बिल अदा करें, कागजात ऑडिट करायें, रिटर्न फाइल करें, हलफनामें बना कर रखें और पैसे के लेन-देन की सभी जानकारी सही रखें। बाइबल हमें सिखाती है कि जब हम छोटे में विश्वासयोग्य रहते हैं तो परमेश्वर हमें बड़ा देता है। अपने देश के कानून का पालन करना हमारी मसीही गवाही का भाग है जिसको प्रत्येक विश्वासी, सेवक व कलीसिया/संस्था को पालन करना ही चाहिये।
  5. निरंतर प्रार्थना करें ताकि परीक्षा में न पड़ें। निरंतर यदि हम इस विषय में प्रार्थना करें तो निश्चय ही निश्चिंत रह सकते हैं कि प्रभु हर समय हर बात को संभालेंगे। लूका 22:40 में प्रभु ने हिदायत दी थी। कट्टरपंथी और राष्ट्रवादी जब चहुँ ओर मसीहियों पर कहर ढा रहे हों, चुप बैठना और प्रार्थना न करना हमारे हक में नहीं है। व्यक्तिगत रूप से, पारिवारिक रूप से, कलीसिया के साथ व शहर भर के पासबानों के साथ मिलकर प्रार्थना करें। प्रार्थना से दुर्घटना से बचा जा सकता है और फिर यदि सताव की परीक्षा घड़ी आ ही जाये तो प्रार्थना आपको शक्ति देगी। ऐसे में संयम से काम लें और अपनी तरफ से कुछ भी करने या बोलने में जल्दबाजी करने का प्रयास न करें। वकील के आने तक चुप रहना आपका अधिकार है और एक मसीही व्यक्ति के रूप में उसको सह लेना व अपने विरोधी को क्षमा कर देना आपका मसीही स्वभाव।
  6. परमेश्वर के लिये जान देने के लिये तैयार रहें। प्रेरितों के काम 21:13 में हम देखते हैं कि पौलुस यरुशलेम को जाने के लिये तैयार हुआ तो उसे बहुतों ने रोकने की कोशिश की क्योंकि वहाँ पौलुस की जान को खतरा था। परंतु डर का आत्मा परमेश्वर ने नहीं दिया। पौलुस ने उन से कहा कि वह प्रभु के लिये न सिर्फ बांधे जाने के लिये बल्कि जान देने के लिये भी तैयार था। सताव कलीसिया के इतिहास का भाग रहा है और इसे अपने विश्वासी जीवन के साथ ग्रहण करना चाहिये। इसको पूरी तरह से टाला नहीं जा सकता। मुझे याद है कि हमारे गाँव में जब ऐसा सताव आया तो हमारी संगति और भी मज़बूत हूई और एक-दूसरे व प्रभु के नज़दीक आई। हम डर नहीं सकते। हम डरते भी नहीं है। यह हमारा एकाधिकार और सौभाग्य है कि हम प्रभु के लिये बांधे जायें, जेल में डाल दिये जायें या प्रभु के लिये मार डाले जायें। ऐसे समय में भी आनंदित रहें।
  7. कानूनी सहायता पहँचाने वाली संस्था के संपर्क में रहें। जहाँ तक हो सके कानूनी पचड़े में पड़ने से बचना अच्छा है क्योंकि भारत में न्याय मिलने में लगने वाला समय बहुत लंबा होता है। कभी कभी व्यक्ति चला जाता है परंतु केस चलता रहता है। हमें कानून के दायरे में रहते हुए कार्य करना चाहिये और एक विधिसम्मत जीवन जीने की गवाही बनाये रखना चाहिये। लेकिन फिर भी कभी ऐसा समय आ सकता है कि सेवा-कार्य के चलते हमें ऐसे किसी कानूनी लड़ाई का सामना करना पड़ जाये जिसमें हम अपना पक्ष एक वकील के अभाव में मज़बूती से नहीं रख सकते। ऐसे में कानूनी संस्था, जो कि इस विषय में अच्छी जानकारी रखती है उसका साथ हमारे लिये आशीष का कारण बन सकता है।

कानूनी सलाहकार जो सताये गये मसीही लोगों की मदद करना चाहते हैं, एक सेवक के लिये बड़ी मदद बन सकता है। कानून की जानकारी होना अलग बात है और उसका सही इस्तेमाल कर पाना अलग बात है। उपरोक्त दी गयी जानकारी आपके कानून में आपके विश्वास में बढ़ाने व सेवाकार्य को हियाव से करने में सहायक साबित हो, ऐसी प्रार्थना करता हूँ। प्रभु आपको आशीष दें।

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