Social work
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समाज कल्याण – क्या यह मसीही विश्वासी का काम है?

समाज कल्याण – क्या यह मसीही विश्वासी का काम है?

Social work

बीते कुछ महिनों से, जब से मुझे काफी समय मिलने लगा है, क्योंकि ज्यादा काम नहीं है,  मैं फेसबुक पर सक्रीय हो गया हूँ। मैंने एक दौर (trend) या ट्रेंड को देखा है कि जहाँ पहले लोग अपने कपड़ों की, घूमने गये वहाँ के अच्छे फोटो, व्यंजन बनायें उनकी फोटो, और अपने शौक की बातों को एक दूसरे के साथ साझा (share) अर्थात शेयर किया करते थे, वहीं आजकल लोग सामाजिक सरोकार से संबंधित विषयों पर बातें करते हैं। हमारे देश और समाज में हो रहे सही और गलत पर अब लोग अपने विचार व्यक्त करने लगे हैं।

फेसबुक, ट्वीटर आदि सोशल मीडिया आजकल काफी सक्रीय (एक्टिव) है जिसका उपयोग लोग अपने देश, समाज तथा जाति व धर्म से जुड़े मसलों पर अपने विचार व्यक्त करने और यहाँ तक की सकारात्मक बदलाव के क्रांतिकारी कार्यों के लिये भी कर रहे हैं। आजकल लोग कॉमेडी क्लिप्स तथा विडियो ज्यादा पोस्ट नहीं कर रहे हैं। अपने परिवार और घूमने फिरने की फोटो नहीं डाल रहे हैं, बल्कि सोशल मीडिया आजकल लोगों को समाज तथा देश में हो रही घटनाओं से जोड़ रहा है। पास देश-विदेश और खास तौर पर भारत तथा नेपाल के कई पोस्ट आते हैं जिनमें सामाजिक सरोकार  से जुड़ी बातों में मैं भी अपना योगदान काफी सक्रीय रूप से करने लगा हूँ।

बीते दिनों में मेरे कुछ विश्वासी और गैर विश्वासी मित्रों ने इस बात पर ध्यान दिया और अपने विचार मुझे प्रकट किये। किसी ने बोला कि भाई, आपको सक्रीय राजनीति में आ जाना चाहिये। हालांकि राजनीति में आना मेरा ध्येय नहीं है परंतु परमेश्वर कि यदि ऐसी मर्जी हो तो ऐसा करने से मुझे कोई गुरेज भी नहीं है। अभी मेरे पास ऐसा कोई दर्शन नहीं है, परंतु साथ ही साथ एक बात पर मेरा ध्यान केंद्रित हुआ कि ऐसे कुछ पेशे हैं जिनमें जाना मसीही विश्वासी पसंद नहीं करते। जैसे कि, हम जो नियमित रूप से कलीसिया में संगति करते हैं, उन्होंने कितने ऐसे लोगों को देखा है जिन्होंने पुलिस महकमें में नौकरी करने का प्रयास किया हो। ऐसा पाया गया है कि मसीही परिवार में जन्में विश्वासी भाई-बहन सक्रीय राजनीति, पुलिस, फौज आदि नौकरी में जाना पसंद नहीं करते। इसका कारण यह भी है कि आजकल की राजनीति में गुंडागर्दी आम बात है, और क्योंकि बाइबल में विश्वास करने वाला व्यक्ति लड़ाई-झगड़े में नहीं पड़ना चाहता इसलिये राजनीति से दूर रहता है, पुलिस में भ्रस्टाचार चरम पर है इसलिये अच्छा विश्वासी उस पेशे से दूर रहना चाहता है, फौज में दुश्मन पर गोली चलानी पड़ती है जबकि बाइबल कहती है कि शत्रु यदि एक गाल पर थप्पड़ मारे तो उसके सामने दूसरा गाल भी कर दो, तो कैसे एक मसीही विश्वासी ऐसे पेशे से जुड़ सकता है। कोई विश्वासी हमारे भारत देश के राजनीतिक पटल पर दिखाई नहीं पड़ता।

आज मैं इन पेशों पर नहीं परंतु सामाजिक सरोकार के काम के विषय में बाइबल की सोच के बारे में आपको बताना चाहता हूँ ताकि हम इस बात पर विचार कर सकें कि क्या सामाजिक कार्य करना सच में एक मसीही विश्वासी का कार्य है, और यदि हाँ, तो हम इसके लिये कितने तैयार हैं और हमें क्या करने की ज़रूरत है।

इस बारे में मैंने पूर हफ्ते विचार किया, प्रार्थना की, बाइबल पढ़ी तथा अनेक अच्छे प्रचारकों के विचार भी सुने जिनमें जॉन पाइपर (John Piper) तथा रिक वॉरेन (Rick Warren) शामिल हैं। सबसे पहले हमें यह समझना होगा कि परमेश्वर कि समाज बारे में क्या सोच है।

बाइबल की पहली पुस्तक ‘उत्पत्ति’ के अध्याय 1 तथा 26 वचन के अनुसार हम सीखते हैं कि परमेश्वर ने मनुष्य जाति की सृष्टि अपने स्वरूप तथा समानता में की। परमेश्वर का स्वरूप कैसा है – परमेश्वर का स्वरूप पवित्र है, अर्थात उसकी सोच, आचार-व्यवहार तथा निर्णय में पाप नहीं हो सकता तो उसके स्वरूप और समानता में रचा गया मनुष्य क्या पापी होना चाहिये। नहीं। परमेश्वर दयासागर है। परमेश्वर प्रेम है, परमेश्वर न्यायी है और इसलिये न्यायसंगत काम ही कर सकता है, अन्याय नहीं। तो क्या मनुष्य अन्यायी, दुष्ट, अधर्मी और घृणा करने वाला हो सकता है। नहीं। परंतु परमेश्वर के द्वारा दी गई स्वतंत्र इच्छा का दुरुपयोग कर मनुष्य पाप कर बैठा और परमेश्वर से दूर हो गया तथा हर प्रकार के अधर्म तथा अन्याय करने लगा जैसे कि अाज के समाज में हमको देखने को मिलता है। परमेश्वर की इच्छा करना छोड़ मनुष्य अपनी मर्जी करने लगा और इसी कारण परमेश्वर की प्रेम, न्याय तथा पवित्रता को छोड़कर मनुष्य हर प्रकार के दुष्कर्मों व अपराधों में लिप्त हो गया है, और इसीलिये आज समाज में असमानता व अन्याय है। यह परमेश्वर की समाज के प्रति इच्छा नहीं है।

प्रेरितों के काम 10:35 – हर जाति (सिर्फ ईसाई नहीं, बल्कि हर धर्म तथा जाति) में जो उससे (परमेश्वर से) डरता है और धार्मिकता के काम करता है, वह उसे भाता है।

इसका अर्थ यह है कि हरेक वो व्यक्ति जो प्रभु यीशु में विश्वास कर अपने पापों की क्षमा प्राप्त कर लेता है और अनंत जीवन का भागी हो जाता है वह ईश्वर के साथ अपने संबंध को बना लेता है और नया कर बढ़ता जाता है। वह ईश्वर का डर मानता है, उसका आदर करता है और इसलिये भले कामों में सलंग्न होता है जो परमेश्वर को भाता है। यहाँ यह ज्ञात रहे कि बाइबल के अनुसार भले कर्मों से तो मोक्ष की प्राप्ति नहीं होती परंतु मुक्ति का अनुभव प्राप्त करने के बाद ईश्वर का भय मानना व भले काम करना हमारे जीवन के लिये ईश्वर की मर्ज़ी है।

1 कुरिन्थियों 2:16 – हम में मसीह का मन है।

मसीह का मन कैसा है? मसीह का मन दूसरों के दुख को देखकर द्रवित होता है। एक वृद्ध विधवा के पुत्र के मर जाने पर यीशु के आँख से आँसू आ गये जबकि उनके लिये कुछ भी मुश्किल नहीं था। वध होने जाति भेड़ के समान भटकी इस्रायल की प्रजा के देखकर यीशु का मन पसीज गया और वह व्याकुल हो उठे। क्या हमारा मन दूसरों के दुख में द्रवित या व्याकुल होता है?

वो सारा बातें जो ईश्वर के मन की हैं, वो हमारे मन की भी होनी चाहिये। कुछ वचन देखते हैं कि परमेश्वर का मन या मर्जी कैसी है।

इफिसियों 2:10 – क्योंकि हम उसके (ईश्वर के) बनाये हुए हैं, और मसीह यीशु में उन भले कामों के लिये सृजे गये जिन्हें परमेश्वर ने पहले से हमारे करने के लिये तैयार किया है। परमेश्वर ने हमें बनाया ही इसलिये है कि हम भले अर्थात पुण्य कर्म करें, तो ऐसा करने से हमारे लिये क्या अनोखी बात हुई कि उससे ईश्वर हमसे प्रभावित हो, बल्कि यदि हम सदकर्म ना करें तो हम ईश्वर के सम्मुख दोषी हो जाते हैं।

लूका 4:18 – प्रभु का आत्मा मुझ पर है इसलिये कि उसने कंगालो को सुसमाचार सुनाने के लिये मेरा अभिषेक किया है, और मुझ इसलिये भेजा है कि बन्दियों को छुटकारे का और अंधो को दृष्टि पाने का सुसमाचार प्रचार करूँ और कुचले हुओं को छुड़ाऊँ… यदि मसीह का मन आप में और मुझ में है तो क्या कुचलों हुओं को, दलितों को छुड़ाना क्या हमारा काम नहीं है, जबकि यह मसीह का मन था।

याकुब 2:13 – क्योंकि जिसने दया नहीं की, उसका न्याय बिना दया के होगा, दया न्याय पर जयवंत होती है। हम दया करने के लिये बुलाये गये हैं। यदि हम दया ना करें तो हम पर भी दया नहीं की जायेगी। यदि हम किसी के पाप माफ ना करें तो हमारे पाप भी क्षमा नहीं किये जायेंगे। जिस माप से हम दूसरों के लिये नापेंगे उसी से हमारे लिये भी मापा जायेगा। यह हमारे लिये कोई चुनाव करने वाली बात नहीं है बल्कि यदि मसीह का मन हममें है तो हमें दूसरों पर दया करनी ही होगी।

गलातियों 6:2 – तुम एक दूसरे का भार उठाओ और इस प्रकार मसीह की व्यवस्था को पूरा करो। प्रभु यीशु मसीह की व्यवस्था पुरानी व्यवस्था से अलग है। हमें इस व्यवस्था के अंतर्गत हमें एक दूसरे का बोझ उठाना है। जिस प्रकार एक महिला शारीरिक रूप से पुरुष की तुलना में कम बोझ उठा सकती है तो उसका बोझ उठाना एक पुरुष होने के कारण मेरा कर्तव्य बन जाता है वैसे ही संसार में जिन जिन आशीषों से हम आशीषित हैं उनका उपयोग दूसरों का बोझ उठाने के लिये करना है, चाहे वो हमारा धन हो, कोई टेलेंट हो, गुण हो, सामर्थ हो, योग्यता हो, सामाजिक स्तर हो, जो भी हो।

1 तिमुथियुस 5:8 – पर यदि कोई अपनों की और निज करके अपने घराने की चिन्ता न करें, तो वह विश्वास से मुकर गया है और अविश्वासी से भी बुरा बन गया है। परमेश्वर हमसे चाहता है कि कम से कम जो हमारे घराने के लोग हैं, हमारे गाँव के लोग हैं, हमारे अपने लोग हैं, उनकी चिंता तो कम से कम हम अवश्य करें अन्यथा हमारा विश्वास ही व्यर्थ है। हमारा पड़ोसी कौन है, हमारा प्रिय कौन है – इसका निर्णय हम अपने आप करें, हालांकि दयालु सामरी का दृष्टांत (लूका 10:30-37) हमें बताता है कि हमारा पड़ोसी कौन है, और हमें क्या करना है। दूसरों की चिंता करनी है, उनका भला करना है – लिखा है, “जा तू भी ऐसा ही कर”। अपने पड़ोसी, अपने घराने की मदद करने के लिये हमें तैयार होना है – हमनें सेंतमेंत पाया है, सेंतमेंत देना है। यदि मसीह का मन हममें है तो हमें जाति तथा धर्म को भूलकर अपने समाज की चिंता करनी है, उसका उत्थान करना है।

अब समाज सेवा को सुसमाचार की सेवा से जोड़ने वाला बाइबल का वचन कौन सा है – 1 पतरस 2:12 – अन्य जातियों में तुम्हारा चालचलन भला हो ताकि जिन-जिन बातों में वे तुम्हें कुकर्मी जानकर बदनाम करते हैं, वे तुम्हारे भले कामों को देखकर उन्हीं के कारण कृपा-दृष्ट् के दिन परमेश्वर की महिमा करें। भारत में गलतफहमियों के कारण भी और गोवा के कैथोलिक व ऑर्थोडोक्स ईसाईयों के आचरण के कारण मसीहीयत का फिल्मों में जो चित्रण हुआ है उसके कारण मसीहियों को हेय दृष्टि से देखा जाता है और यहाँ तक की बहुत से लोग हिंदू धर्म की वर्ण-व्यवस्था के सबसे निम्न वर्ण ‘शूद्र’ से भी नीचा स्थान मसीही विश्वासियों के देते हैं। ऐसे में हमें हमारे जीवन से, समाज के उत्थान का काम परमेश्वर के वचन के अनुसार करके ही हम अपने परमेश्वर की महिमा तथा सुसमाचार के प्रचार का माध्यम बन सकते हैं।

हालांकि १ पतरस के ही २ अध्याय के ९ वचन के अनुसार तो हम परमेश्वर के याजक हैं और राजपदधारी याजकों का समाज हैं। कोई हमें कुछ भी समझे परंतु परमेश्वर की नज़र में हमारा स्थान ऊँचा है, इसलिये समाज-सेवक बनकर हम सुसमाचार की सेवा को बढ़ा सकते हैं। प्रेरितों के काम का 6 अध्याय के 1 से 7 में हम पाते हैं कि स्टीफन को खाना खिलाने की व्यवस्था बनाने के समाज-कार्य की सेवा दी गई थी। हालांकि अपने सदकर्मों के द्वारा परमेश्वर की महिमा का कारण बनें तो भी हमें अपना मुँह बंद नहीं करना है। वह अपने समाज-सेवा के कार्य के साथ सुसमाचार प्रचार की सेवा भी करता था।

मैं इन दिनों भारत का संविधान पढ़ रहा हूँ, सूचना के अधिकार के बारे में समाज के लोगों को जागरूक करना चाहता हूँ, उनके अधिकारों के बारे में उन्हें सजग कर समाज-सेवा का कार्य करना चाहता हूँ, परंतु इसके साथ ही साथ सुसमाचार का कार्य करते रहने के लिये भी कटिबद्ध हूँ। सामाजिक सरोकार के कार्य सुसमाचार की सेवा से जुड़ा हुआ है।

प्रेरितों के काम, अध्याय १३ में हम देखते हैं कि पौलुस ने एक व्यक्ति को सुसमाचार सुन पाने से रोकने वाले का विरोध किया तथा उसको गलत काम करने से रोका। हम कई बार सोचते हैं कि हमें सहना है और इसलिये गलत को गलत नहीं बोलते। हम सोचते हैं कि धीरे बोलना, धीमी-आवाज में बोलना, मीठा बोलना, किसी का विरोध ना करना ही हमारी नम्रता है जो ईश्वर हम से चाहता है – यह सोच एकदम गलत है। प्रभु यीशु ने मंदिर में हो रहे व्यापार के विरुद्ध आवाज़ उठाई, पौलुस ने यहाँ एक जादू और टोना करने वाले की शक्ति का विरोध किया और उसे श्रापित कर बेअसर किया ताकि वह दूसरों के हित के काम करने से उन्हें रोक ना सके।

गलत बात को गलत बोलना और उसके विरुद्ध आवाज उठाना मसीही व्यक्ति के अधिकार में है। बाइबल इसको निषेध नहीं करती है। हम अपने आप के लिये कुछ ज़रूर सह सकते हैं परंतु दूसरों के लिये हम सहानुभूति रख सकते हैं व उनकी मदद कर सकते हैं।

हम दूसरों के लिये नहीं सह सकते क्योंकि किसी दूसरे को लाठी पड़े तो दर्द हमें नहीं होता, हम उसके लिये सहानुभूति रख सकते हैं या उसे बचा सकते हैं। उसी प्रकार हम अपने लिये सहानुभूति नहीं रख सकते और प्रभु यीशु के लिये यदि हमें दुख भी उठाना पड़े तो हम अपने आप को ना बचायें, इस प्रकार सहना और अपना क्रूस उठाना, एक गाल पर चाँटा खाकर भी अपने लिये दूसरा गाल सामने करना एक मसीही के लिये गर्व की बात है।

आप यह ना समझे कि भाई, हमेशा आप सिखाते हैं कि हमें सहना है, मसीही होने के कारण दुख भी उठाने हैं, उसको आनंद की बात समझना है; और आज एक दम से आप कह रहे हैं कि हमें लड़ना है, संघर्ष करना है। नहीं। हमें अपने पर होने वाले दुखों व अन्याय को सहना है और आनंद की बात भी समझना है परंतु साथ ही दूसरों के हित के लिये संघर्ष भी करना है। यह मार्ग आसान नहीं और हमें उसके लिये सहने के लिये तैयार होना होगा, अभी से प्रार्थना करें।

हमारा समाज सेवा, गरीब पर हो रहे अत्याचार, दलित व कुचलों पर हो रहे अन्याय का विरोध व उसके विरुद्ध संघर्ष करने का ध्येय व तरीके गलत नहीं हो सकते, इस बात का ध्यान हमें अपनी मसीही सोच व शिक्षा के आधार पर करना ज़रूरी है।

मैं यह नहीं कहता कि हमें सहना नहीं है, हमें अपने लिये सहना है परंतु दूसरों के लिये सहानुभूति रखनी है। उनकी आवाज बनना है। उनके लिये खड़े होना है, समाज का उत्थान करना है, उनके लिये संघर्ष करना है। हमारे लक्ष्य तथा तरीके दोनों में से कुछ भी नैतिक रूप से गलत नहीं होना चाहिये बल्कि समाज-सेवा व सामाजिक सरोकार के कार्य भी बाइबल की शिक्षाओं पर आधारित, आत्मिक व पवित्र आत्मा से प्रेरित होना ज़रूरी है। सही उद्देश्यों के लिये, सही तरीकों से, संवैधानिक तरीके से हमें समाज में हो रहे अन्याय के विरुद्ध खड़े होना चाहिये। परमेश्वर का वचन हमें ऐसा करने के लिये प्रेरित करता है, इसके लिये मैं पुराने तथा नये नियम से कुछ वचन आपको बताता हूँ।

नीतिवचन 14:21 – जो अपने पड़ोसी के तुच्छ जानता है वह पाप करता है, परंतु जो दीन लोगों पर अनुग्रह करता, वह धन्य होता है।

नीतिवचन 31:8-9 – गूँगे के लिये अपना मुँह खोल, और सब अनाथों का न्याय उचित रीति से किया कर। अपना मुँह खोल और धर्म से न्याय कर, और दीन दरिद्रों का न्याय कर।

यशायाह  1:17 – भलाई करना सीखो, यत्न से न्याय करो, उपद्रवी को सुधारो, अनाथ का न्याय चुकाओ, विधवा का मुकदमा लड़ो।

इसी प्रकार हम नये नियम में हम पाते हैं, धन्य हैं वे जो दयावंत है, उन पर भी दया की जायेगी – मत्ती 5:7

1 थिस्सलुनीकियों 5:15 – सावधान। कोई किसी से बुराई के बदले बुराई न करे, पर भलाई करने पर तत्पर रहो।

इसके बाद अंतिम वचन जिसके द्वारा में इस संदेश को खत्म करना चाहता हूँ वह इस प्रकार है –

याकुब 4:17 – जो कोई भलाई करना जानता है और नहीं करता, उसके लिये वह पाप है।

अब आपको सब मालूम चल गया है। समाज की भलाई के लिये क्या करना है, अपनी योग्यता आपको मालूम है और क्या करना चाहिये। समाज के उत्थान से हम अपने आप को अलग नहीं कर सकते, हमें अच्छा सामरी बनना है, उनकी मदद करनी है जो अपने आपकी मदद नहीं कर सकते, उनकी आवाज बनना है जो बोलना नहीं जानते, उनका मुकदमा लड़ना है जो लड़ नहीं सकते। हमें अपने व्यक्तिगत अधिकारों को जहाँ पूरी तरह से छोड़ने के लिये तैयार होना है, हमें दूसरों के हक के लिये संघर्ष करना सीखना है। यह परमेश्वर की मर्जी है जो हमें इस संसार में पूरी करनी है।

यीशु मसीह की जय।