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शरीर, प्राण और आत्मा – दर्द का अनुभव

शरीर, प्राण और आत्मा – दर्द का अनुभव

कल एक अच्छा सवाल मेरे सामने आया। मैं बहुत बार यह बताता हूँ कि दर्द का अनुभव शरीर को नहीं लेकिन आत्मा को होता है। हालांकि शरीर को कोई गर्म चीज छू जाये तो हम उछल पड़ते हैं तो भी अगर दर्द का अनुभव शरीर को ही होता तो मुर्दों को जब चिता पर रख कर जला दिया जाता है तो उस को उठकर भागना चाहिये परंतु प्राण और आत्मा शरीर से निकल जाने के बाद शरीर की सभी क्रियाएं और अनुभव खत्म हो जाते हैं। मरने के बाद शरीर को जला दो, या काट दो (पोस्टमॉर्टम) उसे किसी प्रकार के दर्द का अनुभव नहीं होता।

जहाँ यह बात सच है, कल एक मित्र के सुपुत्र ने पूछा, “अंकल, जब कोई नस सुन्न हो जाये या मनुष्य बेहोशी अथवा कोमा की अवस्था में हो तब भी तो उसे दर्द का अनुभव नहीं होता जबकि अभी आत्मा तो शरीर के अंदर ही है। ऐसा क्यों?”

यह एक बहुत अच्छा सवाल है। मैं भी कुछ पल के लिये सोचने लगा कि इस दृष्टिकोण से मैंने भी कभी इस बात को नहीं सोचा व समझा। परंतु उत्तर देना ज़रूरी था इसलिये मन में ही प्रार्थना कर मैं उत्तर देने लगा और पवित्र आत्मा ने इसे हम पर प्रकट किया। यह बात सच है कि जीवन आत्मा में ही है न कि शरीर में और इसलिये दर्द का अनुभव भी आत्मा को ही हो सकता है शरीर को नहीं क्योंकि बिना आत्मा और प्राण के शरीर निर्जीव है। जिस प्रकार दुनिया में प्रचलित भी है कि एक मृतक के शरीर को हम पार्थिव शरीर बोलते हैं, जिसका अर्थ है कि जो पत्थर के समान (निर्जीव) हो चुका है। परंतु साथ ही साथ यह भी समझना जरूरी है कि संसार में रहते हुए हमारी आत्मा, शरीर व प्राण के साथ मिलकर ही सजीव रुप में कार्य करती है। इसका अभिप्राय यह है कि शरीर, आत्मा तथा प्राण एक सिस्टम की तरह मिलकर काम करते हैं।body-soul-spirit

आत्मा में जीवन है जो अनुभव करती है और अंत में सभी कर्मों का उत्तरदायित्व उसका है, ईश्वर को अपने कर्मों का हिसाब भी आत्मा को ही देना पड़ता है। प्राण हमारी सोच व इच्छा का काम करता है जिसे हम मन भी कहते हैं जो संसार की वस्तुओं में रुचि लेता है, उनसे उत्साहित होता है, उनमें लिप्त होता है और आत्मा की आवाज की अनसुनी कर भी उनमें लिप्त होता है क्योंकि संसार की चीजें शरीर को आनंद देने वाली होती हैं (भले ही आत्मा उसमें खुश न हो और अंतरात्मा बार बार ऐसे कामों को करने से मना करे)।

जब हमें कोई गर्म चीज छू जाती है तो शरीर के द्वारा ही आत्मा को यह अनुभव पहुंचता है और आत्मा को दर्द का अनुभव होता है, बिना शरीर के आत्मा संसार की वस्तुओं से कोई संपर्क कर अनुभव प्राप्त नहीं कर सकती। इसीलिये जब शरीर कि भी दुर्घटना या शरीर की बीमारी या दिमाग के अचेतन हो जाने पर काम करना बंद कर देता है तो अात्मा उतने समय के लिये उस दर्द को अनुभव नहीं करती और इसीलिये बेहोशी यो कोमा में पड़ा व्यक्ति आत्मा शरीर में होते हुए भी दर्द का अनुभव नहीं कर सकता।

तो मृत्यु के बाद जब हम यह शरीर छोड़ देंगे तब आत्मा को कोई अनुभव नहीं होगा तो फिर जो आत्मा नर्क में आग की झील में भी गई तो उसको दर्द का अनुभव क्योंकर होगा, उसके पास तो शरीर नहीं और बिना शरीर जलन का अनुभव भी नहीं?

अब एक सवाल के जवाब में से एक और सवाल निकल कर आया है। इसका जवाब हमें प्रभु यीशु के वचनों में मिलता है।जब प्रभु यीशु से सदुकियों ने सवाल किया कि सात भाईयों की पत्नी रह चुकि एक औरत उनमें से किसकी पत्नी होगी जब वे पुनरुत्थान के समय जी उठेंगे। स्वाभाविक सवाल है। प्रभु यीशु ने उनको स्पष्ट किया था कि मृत्यु के बाद पुनरुत्थान है, जिसके होने के बाद जो शरीर मिलेंगे वे शादी ब्याह नहीं करेंगे क्योंकि वे स्वर्गदूतों के समान होंगे (लूका 12:18-27, विशेष – 25 वचन) जो संतानोत्पत्ति के द्वारा वंश नहीं बढ़ाते।

परंतु प्रभु का वचन बताता है कि मृत्यु के बारे में हमारी समझ असलियत से दूर है। असल में, शारीरिक मृत्यु बस देह की मृत्यु है जिसमें आत्मा शरीर से अलग हो जाती है परंतु यह आत्मा की मृत्यु नहीं है। आत्मा का अनुभव आत्मिक है और शरीर के साथ वह शारीरिक वेदना को अनुभव करती है। मृत दशा में भी आत्मा खत्म नहीं होती या निर्जीव नहीं होती बल्कि वह परमेश्वर (सृजनहार, पालनहार, तारणहार परमात्मा) से अलग हो जाती है, इसलिये आत्मिक रुप से उसकी वेदना, परमेश्वर से दूरी होने पर छटपटाने की, प्यास और अकेलेपन की व मुक्ति पाने की व्याकुल अवस्था है। उद्धार पाये बिना हरेक आत्मा मृत अवस्था में होती है तो भी शरीर में होते हुये दर्द के अनुभव को जानती है। प्रभु यीशु पर विश्वास कर उनको ग्रहण करने पर ही आत्मा पापमुक्त होती है तथा उसका नया जन्म होता है जिसमें उसे शाश्वत जीवन मिलता है। शारीरिक मृत्यु के समय सिर्फ शरीर मरता है जिसमें आतंरिक मनुष्य देह से अलग हो जाता है और आत्मा अपने पुनरुत्थान के लिये दूसरे स्थानों पर जाती हैं, धर्मी स्वर्ग जाते हैं (फिलिप्पियों 1:23, 2 कुरिन्थियों 5:8) और पापी, दुष्ट व अधर्मी अधोलोक जाते हैं (लूका 16:19-31, यशायाह 14:9)।

पुनरुत्थान होने पर केवल शरीरों को जीवित और अविनाशी बनाया जाता है (1 कुरिन्थियों 15:51-52)। यह हाड़-माँस का शरीर नहीं परंतु एक अलग ही शरीर होगा जिसकी कल्पना हम अभी नहीं कर सकते, परंतु यह कभी बूढ़ा नहीं होगा, जर्जर नहीं होगा और अनंत काल के लिये रहेगा। फिर अविनाशी आत्मा, जो स्वर्ग अथवा अधोलोक में प्रतीक्षा करती थी, उसमें प्रवेश करती है ताकि शरीर और आत्मा अब अनंतकाल के लिये चेतन अवस्था में रह सकें। जिनके पाप क्षमा हुए वे परमेश्वर की उपस्थित में आनंद मना सकें व शांति का अनुभव हमेशा के लिये कर सकें और जो पाप की दशा में परमेश्वर के प्रेम का तिरस्कार कर प्रभु यीशु द्वारा चुकाई गई पापों कि कीमत को ठुकराकर मर गये वे चेतन रूप में अपने नये शरीर में आत्मा उस सज़ा का जो आग की झील के रूप में बताई गई है और उस पीड़ा का जो आग में जलने से होती है, सर्वदा काल के लिये अनुभव कर सकें। वह अविनाशी शरीर जो आग में भस्म नहीं होने वाला, कितने समय की पीड़ा झेलेगा इसका अनुमान लगाना तो आज संभव नहीं, परंतु इस नर्क अग्नि से छुटकारा पाने का इंतज़ाम आज किया जा सकता है। अपने पापों को पहचानें, प्रभु यीशु ने आपके पापों की कीमत चुकाई है, इस पर विश्वास करें और अपने पापों से छुटकारा पायें।

प्रभु आपको आशीष दें।