Revelation
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 विश्वासियों के नाम संदेश – क्या सिर्फ प्रभु यीशु के विश्वासी होने के कारण आप स्वर्ग चले जायेंगे?

इब्रानियों की पुस्तक के तीसरे अध्याय में एक खास बात की ओर ध्यान आकर्षित किया गया है। वचन 12 से 19 को पढ़ने से हम पाते हैं कि परमेश्वर का वचन विश्वासियों को परमेश्वर की आज्ञाकारिता में चलने के विषय में प्रेरित करता है। मूसा के समय में बंधुआई से निकले इस्रायलियों का उदाहरण आज के संदर्भ में पाप से क्षमा व छुटकारा पाये विश्वासियों को दिखाता है। मिस्र देश से निकलने वाले लोग परमेश्वर के जन थे परंतु अपने अविश्वास, हठी, कुड़कुड़ाहट के कारण वाचा किये हुए विश्राम स्थान में अर्थात कनान देश में कभी नहीं पहुँचने पाये। इब्रानियों कि पुस्तक के अध्याय 3, वचन 16 से 19 तक स्पष्ट तौर पर बताया गया है कि विचार करो कि वो कौन थे, क्या अन्यजाति थे, अविश्वासी थे – नहीं, वे सब के सब परमेश्वर के चुने हुए लोग थे। फिर परमेश्वर उनसे नाराज क्यों था – क्योंकि उन्होंने आज्ञा नहीं मानी, और अंग्रेजी की बाइबल कहती है “(God was angry) was it not with those who sinned…”, अर्थात परमेश्वर ने अनाज्ञाकारिता को स्पष्ट रूप से पाप बताया है।

आज परमेश्वर का वचन हमसे बात कर रहा है और यही सवाल हमारे सामने हैं – क्या हम अविश्वासी हैं या विश्वासी? हम विश्वासी हैं तो यह वचन हमारे लिये है। क्या परमेश्वर अन्यजातियों से नाराज था या अपनी प्रजा से? अपनी प्रजा से। तो आज परमेश्वर क्या अविश्वासियों की मूर्तिपूजा से ही नाराज है? नहीं, बल्कि विश्ववासियों के अविश्वास, अनाज्ञाकारिता, हठ और पाप से मन न फिराने की ढीठाई से। क्या परमेश्वर ने अपनी प्रजा को जो ढीठाई कर रही थी, विश्राम स्थान में प्रवेश करने दिया? नहीं, तो क्या परमेश्वर को जानने के बावजूद भी अपने विचारों से, स्वभाव से, चालचलन से या कर्म से अनाज्ञाकारिता, पाप और ढीठाई करने वालों को परमेश्वर के विश्राम-स्थान अर्थात स्वर्ग में प्रवेश सिर्फ इसलिये मिल जायेगा क्योंकि हम विश्वासी हैं? नहीं।

इसलिये आज वचन 12 व 15 को फिर से पढ़ें – अपने मन से अविश्वास को हटायें, अपने मन को कठोर न करें, पाप से क्षमा मांगें। मन कठोर कैसे होता है – जब एक ही पाप को हम बार बार करते हैं – परमेश्वर के वचन, प्रभु के दास और हमारे अंदर रहने वाले पवित्र आत्मा की आवाज़ को सुनकर भी अनसुना करके हम उसी पाप को दोहराते हैं तो हमारा मन कठोर होता जाता है और अंततः हमें वह पाप भारी नहीं लगता और करने के बाद मन खेदित भी नहीं होता। चाहे वो एक छोटी व साधारण सी आदत हो, बोलने का तरीका हो, मन की कुड़कुड़ाहट हो या कोई गंभीर पाप, अपने आप को उससे अलग होने के लिये अपने मन को तैयार करें व परमेश्वर पर विश्वास करें, आज्ञाकारी बनें और पश्चाताप करें।

आज

भजन संहिता के अंश से लेकर तीसरे व चौथे अध्याय में एक समय नियुक्त किया गया है कि कब हमें इस बात की जाँच करनी है, कब हमें निर्णय लेना चाहिये – आज।

यदि आज तुम उसका शब्द सुनो,
तो अपने मनों को कठोर न करो।
[भजन संहिता 95:7,8]

आज अपने आप को जाँच लें, अन्यथा वचन 19 के अनुसार अविश्वास के कारण हम विश्वासी होकर भी परमेश्वर के स्वर्ग राज्य में प्रवेश नहीं कर पायेंगे। परंतु हम कितने भी बड़े पापी हों (परमेश्वर को जानने के बाद भी), यदि सच्चे मन से पश्चाताप करेंगे तो अवश्य ही परमेश्वर के विश्राम में प्रवेश करने पायेंगे।